नीमच। मध्यप्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में महिला सरपंचों के निर्वाचित होने के बावजूद पंचायत से जुड़े कार्यों और निर्णयों में उनके पति या अन्य परिजनों की भूमिका को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। इसी मुद्दे को लेकर कांग्रेस के पूर्व जिला उपाध्यक्ष एवं नीमच-जावद विधानसभा क्षेत्र क्रमांक 230 के एडवोकेट प्रकाश रांका ने कहा कि ग्राम पंचायत लोकतंत्र की सबसे निचली और महत्वपूर्ण इकाई है। जनता जिस व्यक्ति को सरपंच चुनती है, पंचायत के कार्यों, योजनाओं, विकास कार्यों और प्रशासनिक मामलों में संवाद उसी निर्वाचित सरपंच से होना चाहिए।
एडवोकेट रांका ने कहा कि महिला आरक्षण का उद्देश्य महिलाओं को नेतृत्व का अवसर देना है। निर्वाचित महिला सरपंचों को पंचायत के कामकाज और निर्णय प्रक्रिया में प्रभावी भूमिका निभाने का अवसर मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि पति या परिवार के सदस्य सहयोग कर सकते हैं, लेकिन निर्वाचित पद की जिम्मेदारी और जवाबदेही सरपंच की ही होती है।
ग्रामीण भी बढ़ाएं जागरूकता-
रांका ने ग्रामीणों से पंचायत से संबंधित जानकारी, शिकायत या कार्य के लिए सीधे निर्वाचित सरपंच से संवाद करने तथा पंचायत के निर्णयों की जानकारी स्वयं लेने की अपील की। उन्होंने कहा कि ग्रामीणों की जागरूकता से पंचायतों में पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा मिल सकता है।
महिला सरपंचों के अधिकारों को लेकर जागरूकता की मांग-
एडवोकेट रांका ने शासन से मांग की कि महिला सरपंचों को उनके संवैधानिक एवं वैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक करने के लिए प्रभावी प्रयास किए जाएं। साथ ही पंचायतों में पारदर्शिता बढ़ाने और यह सुनिश्चित करने के लिए निगरानी व्यवस्था मजबूत की जाए कि निर्वाचित प्रतिनिधि की भूमिका केवल कागजों तक सीमित न रहे। उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण के माध्यम से निर्वाचित प्रतिनिधियों को नेतृत्व और निर्णय लेने की वास्तविक भूमिका मिलना जरूरी है।