कटनी। मान्यताओं के अनुसार, भगवान परशुराम ने सबसे पहले कांवड़ यात्रा की शुरुआत की थी। परशुराम गढ़मुक्तेश्वर धाम से गंगाजल लेकर आए थे और यूपी के बागपत के पास स्थित पुरा महादेव का गंगाजल से अभिषेक किया था। उस समय सावन मास ही चल रहा था। इसी के बाद से कांवड़ यात्रा की शुरुआत हुई। आज भी इस परंपरा का पालन किया जा रहा है।
सबसे पहले जान लेते हैं कि कांवड़ यात्रा क्या होती है. दरअसल धार्मिक शास्त्रों के मुताबिक भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग पर गंगा जल चढ़ाने की परंपरा को कांवड़ यात्रा कहा जाता है. ये जल एक पवित्र स्थान से अपने कंधे पर ले जाकर भगवान शिव को सावन की महीने में अर्पित किया जाता है। इस यात्रा के दौरान भक्त बल भोले के नारे लगाते हुए पैदल यात्रा करते हैं. कहा ये भी जाता है कि कांवड़ यात्रा करने वाले भक्तों को अश्वमेघ यज्ञ के समान पुण्य मिलता है। दरअसल धार्मिक शास्त्रों के मुताबिक भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग पर गंगा जल चढ़ाने की परंपरा को कांवड़ यात्रा कहा जाता है. ये जल एक पवित्र स्थान से अपने कंधे पर ले जाकर भगवान शिव को सावन की महीने में अर्पित किया जाता है. इस यात्रा के दौरान भक्त बल भोले के नारे लगाते हुए पैदल यात्रा करते हैं सावन के महीने में कटनी के गिरजा घाट से हजारों की तादात में कावड़िया भक्त कावर लेकर नृत्य करते हुए निकले इन तस्वीरों में कावड़ लिए कालो के काल महाकाल को प्रसन्न करने नंगे पैर बैजनाथ धाम के लिए हजारों की तादाद में भगवान की झांकी के साथ अद्भुत नृत्य करते हुए निकले ये अद्भुत नजारा देखते ही लोगो के पैर रुक गए सड़को पर जनता एकत्र हो गई यात्रा पर जा रहे कावडियो को श्री फल दे रवाना किया गया।