चित्तौड़गढ़। भारत के विभिन्न राज्यों में निवासरत आदिवासियों की संस्कृति और पहचान समाप्त करने एवं विकास के नाम पर जल, जंगल, जमीन से बेदखल करने के लिए बनाये जा रहे कानून पर रोक की मांग को लेकर राष्ट्रीय आदिवासी एकता परिषद के चरणबद्ध आन्दोलन के अंतिम चरण में राष्ट्रपति के नाम जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा।
राष्ट्रीय आदिवासी एकता परिषद के देवीलाल मीणा के नेतृत्व में दिये ज्ञापन में बताया गया कि संविधान में आदिवासी समुदाय एसटी के रूप में पहचान प्राप्त है तथा इसके अधिकार प्राप्त है। इन्होंने विदेशी आक्रमणकारियों से लड़ते हुए गुलाम भारत में जल, जंगल, जमीन और अपनी संस्कृति को सुरक्षित करने में जान की बाजी लगाई लेकिन विकास एवं वन्य प्राणियों के संरक्षण के नाम इन्हें विस्थापित किया गया। राज्य व केन्द्र सरकार को संविधान के अनुसार दखल देने का अधिकार नहीं है लेकिन सरकारें लगातार अनसूनी हो रही है जिससे आक्रोशित संगठनों को आन्दोलन करना पड़ रहा है। इन्होंने कॉमन सिविल कोड, विकास के नाम पर विस्थापन, विकास के नाम पर हाईवे निर्माण से बढ़ते खतरे, मणिपुर के आदिवासयों पर अन्याय एवं अत्याचार करने सहित कईं तरह के अत्याचारों के कानून के विरोध में राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपा गया।
इस अवसर पर मांगीलाल सोलंकी, रामावतार मीणा, रामकुमार चावला, रामचन्द्र रेगर, सीता लोठ, किशन लोठ, बद्रीलाल मीणा, बाबूखां रंगरेज, नारायण लाल रेगर, राजेन्द्र, मोहम्मद साबीर, देवीलाल मीणा सहित कई पदाधिकारी उपस्थित थे।