चित्तौड़गढ़। नेमाटोड के सूक्ष्म आकार और स्पष्ट लक्षण उत्पन्न न होने के कारण, किसान आम तौर पर नुकसान के बारे में अनभिज्ञ रहते हैं। नेमाटोड से होने वाले नुकसान को ध्यान में रखते हुए राजस्थान कृषि महाविद्यालय, महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के नेमाटोड वैज्ञानिकों की एक सर्वेक्षण टीम ने गेहूं और जौ पर अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना (एआईसीआरपी) के तहत गेहूं और जौ नेमाटोड के लिए किसानों के खेतों का दौरा किया। इसमे डॉ दीपक कुमार और डॉ राम नारायण कुम्हार की सर्वेक्षण टीम ने चित्तौड़गढ़ जिले के गाँवो के किसानो से मुलाकात कर पादप परजीवी नेमाटोड से संक्रमित पोधे और मिट्टी के नमूने एकत्रित किये। इस दौरान डॉ. दीपक कुमार ने किसानो को गेहू के पुट्टी नेमाटोड के लक्षण दिखाए जिसमे जड़ो पर मोतिनुमा सफ़ेद रंग की मादा की पहचान बताई और उसके प्रबंधन उपायों के बारे में भी बताया। इसके साथ साथ वैज्ञानिकों ने सुरजाखेडा गाँव के पॉलीहाउस के किसान कैलाश चन्द्र जाट, मुकेश जाट और प्रह्लाद जाट से मुलाकात कर नेमाटोड के संक्रमण से होने वाले नुकसान के बारे में बातचीत की। इसमे कैलाश चन्द्र ने पॉलीहाउस में निमेटोड रहित विकल्प के बारे में चर्चा की। डॉ. राम नारायण कुम्हार ने टमाटर की फसल में जड़-गाठ नेमाटोड का भारी संक्रमण दिखाते हुए उनके प्रबंधन के विकल्पों पर सुझाव दिया। इस सर्वेक्षण टीम के साथ राज कुमार वर्मा (विद्यावाचस्पति) ने फसलो से मिट्टी और पौधों की जड़ें के नमूने एकत्रित किये। अफीम में नेमाटोड जैसे लक्षण दिखने के बारे में अफीम उत्पादकों की गंभीरता को देखते हुए वैज्ञानिकों ने अफीम के खेतों का भी दौरा किया और प्रयोगशाला विश्लेषण के लिए मिट्टी के नमूने एकत्र किये।