इंदौर। शहर की ऐतिहासिक धरोहर गांधी हॉल को स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत 13 करोड़ रुपए में संवारा गया था। मेंटेनेंस के अभाव में यह फिर से जर्जर होने लगा है। अभी स्थिति यह है कि लाइब्रेरी में सीपेज का पानी आ रहा है। निर्माण के समय इसका ध्यान नहीं रखा गया था। दो साल से निगम पीपीपी मॉडल पर इसे निजी हाथों में सौंपना चाह रहा, लेकिन वह प्रोजेक्ट भी अटक गया। अब इसे पर्यटन विभाग को देने की तैयारी है। इसके लिए पहले सर्वे करवाया जाएगा।
वर्ष 1904 में बने गांधी हॉल को स्मार्ट सिटी कंपनी ने संवारा था। भवन के बाहरी हिस्से की मजबूती और पत्थरों की पॉलिश के अलावा हॉल की लकड़ी की नक्काशी को भी पुराने अंदाज में बनाया गया है, ताकि उसका मूल स्वरूप वैसा ही रहे। पहले इसे किंग एडवर्ड हॉल के नाम से जाना जाता था, लेकिन आजादी के बाद इसका नाम गांधी हॉल रख दिया गया।
होलकरकाल में डिजाइन तैयार हुआ, शैली राजपूताना रखी गई
गांधी हॉल का डिजाइन होलकरों के शासनकाल में वास्तुकार जेजे स्टीवेंस ने तैयार किया था। इसकी निर्माण शैली राजपूताना रखी गई है। पाटन के पत्थरों से बनी इस इमारत को लोग घंटाघर के नाम से भी जानते हैं, क्योंकि गांधी हॉल की ऊपरी मंजिल पर लगी घड़ी दूर से ही लोगों को समय बता देती है। इसी विरासत को संभालने के लिए स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत इसका जीर्णाेद्धार किया गया था।
लीकेज रोकने वाटर प्रूफिंग
लाइब्रेरी में सीपेज की समस्या ठीक करने के लिए इसकी वाटर प्रूफिंग करवाई जाएगी। इस धरोहर को सहेजने पर पैसा खर्च किया गया, लेकिन इसके मेंटेनेंस की कोई व्यवस्था नहीं है। यह संपत्ति निगम की है, लेकिन इसे संवारने का काम स्मार्ट सिटी कंपनी ने किया था। अब यह सुनसान रहता है।
खाली बिल्डिंग मेंटेनेंस के अभाव में खराब होने लगी है। पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत निगम ने एक एजेंसी को काम देने की तैयारी भी कर ली थी। रेस्टोरेंट भी खोला जाना था, लेकिन एमआईसी की आपत्ति के बाद इस प्रोजेक्ट को रोक दिया गया।