खरगोन। जिले में निमाड़ अंचल की मिट्टी में लोक परंपराएं आज भी जीवंत हैं। इन्हीं प्राचीन परंपराओं में से एक है ‘डोडगली अमावस्या’, जिसे कई क्षेत्रों में ‘डेडगली अमावस्या’ के नाम से भी जाना जाता है। ज्येष्ठ मास में आने वाली यह अनूठी लोक परंपरा मुख्य रूप से अच्छी वर्षा और मानसून के आगमन की कामना से जुड़ी हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह पर्व बच्चों, बुजुर्गों और पूरे समाज को एक सूत्र में बांधने का कार्य करता है।
इस परंपरा के तहत गांव के बच्चे और किशोर समूह बनाकर निकलते हैं। इनमें एक बच्चे को पलाश (टेसू) की पत्तियों और डालियों से सजाकर ‘मेंढक’ का रूप दिया जाता है। निमाड़ी बोली में मेंढक को ‘डेडर’ कहा जाता है, इसी कारण इस परंपरा का नाम ‘डोडगली’ या ‘डेडगली’ पड़ा।
बच्चों की टोलियां गांव में घर-घर जाकर पारंपरिक निमाड़ी गीत और तुकबंदियां गाती हैं। इन गीतों में अच्छी बारिश, हरियाली और खुशहाली की कामना की जाती है। ग्रामीण भी इस लोक परंपरा में उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं और बच्चों को तेल, आटा, अनाज व अन्य खाद्य सामग्री दान स्वरूप देते हैं।
जब बच्चे गांव में घूमते हैं, तब ग्रामीण और बुजुर्ग पलाश की पत्तियों से सजे ‘मेंढक’ बने बच्चे पर पानी छिड़कते हैं। यह परंपरा प्रतीकात्मक रूप से इंद्र देव को प्रसन्न करने और अच्छी वर्षा का आह्वान करने का संदेश देती है। लोक मान्यता है कि इससे मानसून जल्दी आता है और खेतों में भरपूर फसल होती है।
बच्चों द्वारा एकत्रित किए गए अनाज और सामग्री से गांव में सामूहिक रूप से दाल-बाटी एवं पारंपरिक भोजन तैयार किया जाता है। इसके बाद सभी बच्चे और ग्रामीण मिलकर सामुदायिक भोज करते हैं। यह आयोजन आपसी प्रेम, सहयोग और भाईचारे की भावना को मजबूत करता है।
‘डोडगली अमावस्या’ केवल वर्षा की कामना का पर्व नहीं, बल्कि निमाड़ की समृद्ध लोक संस्कृति, प्रकृति के प्रति सम्मान और सामुदायिक एकता का भी प्रतीक है। आधुनिकता के दौर में भी ग्रामीण अंचलों में इस परंपरा का जीवित रहना निमाड़ की सांस्कृतिक पहचान को दर्शाता है। यह पर्व नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और लोक संस्कृति से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बना हुआ है।