मनासा। केवल डिग्री प्राप्त कर लेने से ज्ञान नहीं आता, बल्कि सच्चे ज्ञान के लिए गुरु का सानिध्य परम आवश्यक है। गुरु कृपा का सागर होना चाहिए, जिसमें शिष्य डूबकर ज्ञान प्राप्त कर सके। गुरु नर रूप में हरि के समान हों और उनका ज्ञान सूर्य के प्रकाश की भांति जीवन को आलोकित करने वाला हो। यह उद्गार संत गिरधर स्वामी ने नगर के श्रीराम मंदिर में आयोजित श्रीराम कथा के दूसरे दिन उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
संत श्री ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस की प्रथम चौपाई में गुरु अथवा गुरु के चरणों की नहीं, बल्कि गुरु के चरणों की रज की वंदना की है। जिस प्रकार श्मशान की राख को कोई स्पर्श नहीं करता, लेकिन वही भस्म भगवान महाकाल का स्पर्श पाकर पूजनीय हो जाती है और लोग उसे अपने मस्तक पर धारण करना सौभाग्य मानते हैं, उसी प्रकार गुरु चरणों की रज भी जीवन को पवित्र और कल्याणकारी बना देती है।
उन्होंने रामचरितमानस की चौपाई गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन, नयन अमिय दृग दोष विभंजन का भावार्थ बताते हुए कहा कि गुरु चरणों की रज वह दिव्य अंजन है, जो मनुष्य की दृष्टि, सोच और जीवन दृष्टिकोण को सकारात्मक बनाकर उसे सन्मार्ग की ओर अग्रसर करती है। गुरु ही व्यक्ति के जीवन में अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं।
संत गिरधर स्वामी ने कहा कि तुलसीदास जी ने गुरु वंदना के पश्चात मोक्षदायिनी अयोध्या नगरी, पावन सरयू नदी, माता कौशल्या तथा पृथ्वी के देवता कहे जाने वाले ब्राह्मणों को प्रणाम किया है। उन्होंने कहा कि ब्राह्मणों को भी अपने आचरण को देवतुल्य बनाए रखना चाहिए, तभी समाज उन्हें उसी श्रद्धा और सम्मान के साथ पूजेगा। श्रीराम कथा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु भक्ति भाव से कथा एवं भजनों का श्रवण कर रहे हैं।