मनासा। नगर के श्रीराम मंदिर में आयोजित 15 दिवसीय श्रीराम कथा के दूसरे दिन कथा वाचक संत श्री गिरधर स्वामी ने रामचरितमानस की प्रथम चौपाई का भावपूर्ण एवं विस्तृत विवेचन करते हुए गुरु महिमा का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि केवल डिग्री प्राप्त कर लेने से ज्ञान नहीं आता, बल्कि सच्चे ज्ञान के लिए गुरु का सान्निध्य, आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन आवश्यक है।
संत श्री ने कहा कि गुरु की चरण रज अत्यंत पवित्र और अमूल्य होती है, जो मनुष्य की दृष्टि, सोच और जीवन को निर्मल बनाती है। गोस्वामी तुलसीदास की चौपाई ष्गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन, नयन अमिय दृग दोष विभंजनष् का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि गुरु चरणों की धूल रूपी अंजन हमारे अज्ञान, अहंकार और जीवन के दोषों को दूर कर हमें सन्मार्ग की ओर अग्रसर करती है।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार भस्म भगवान महाकाल का स्पर्श पाकर पूजनीय बन जाती है, उसी प्रकार गुरु चरणों का स्पर्श पाकर चरण रज भी जीवन को पवित्र और प्रकाशमय बना देती है। गुरु ही शिष्य की दृष्टि को बदलकर उसे सत्य, धर्म और ज्ञान के मार्ग पर आगे बढ़ाते हैं।
प्रवचन के दौरान संत श्री ने अयोध्या नगरी, सरयू नदी, माता कौशल्या तथा सनातन संस्कृति में गुरु एवं माता-पिता के महत्व का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में गुरु, माता-पिता एवं प्रकृति का सर्वाेच्च स्थान है, जिनके प्रति श्रद्धा और सम्मान का भाव जीवन को सार्थक बनाता है।
कथा के समापन पर श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीराम की आरती कर प्रसाद ग्रहण किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और गुरु वचनों का श्रवण कर आध्यात्मिक लाभ प्राप्त किया।
मनासा। नगर के श्रीराम मंदिर में आयोजित 15 दिवसीय श्रीराम कथा के दूसरे दिन कथा वाचक संत श्री गिरधर स्वामी ने रामचरितमानस की प्रथम चौपाई का भावपूर्ण एवं विस्तृत विवेचन करते हुए गुरु महिमा का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि केवल डिग्री प्राप्त कर लेने से ज्ञान नहीं आता, बल्कि सच्चे ज्ञान के लिए गुरु का सान्निध्य, आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन आवश्यक है।
संत श्री ने कहा कि गुरु की चरण रज अत्यंत पवित्र और अमूल्य होती है, जो मनुष्य की दृष्टि, सोच और जीवन को निर्मल बनाती है। गोस्वामी तुलसीदास की चौपाई ष्गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन, नयन अमिय दृग दोष विभंजनष् का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि गुरु चरणों की धूल रूपी अंजन हमारे अज्ञान, अहंकार और जीवन के दोषों को दूर कर हमें सन्मार्ग की ओर अग्रसर करती है।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार भस्म भगवान महाकाल का स्पर्श पाकर पूजनीय बन जाती है, उसी प्रकार गुरु चरणों का स्पर्श पाकर चरण रज भी जीवन को पवित्र और प्रकाशमय बना देती है। गुरु ही शिष्य की दृष्टि को बदलकर उसे सत्य, धर्म और ज्ञान के मार्ग पर आगे बढ़ाते हैं।
प्रवचन के दौरान संत श्री ने अयोध्या नगरी, सरयू नदी, माता कौशल्या तथा सनातन संस्कृति में गुरु एवं माता-पिता के महत्व का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में गुरु, माता-पिता एवं प्रकृति का सर्वाेच्च स्थान है, जिनके प्रति श्रद्धा और सम्मान का भाव जीवन को सार्थक बनाता है।
कथा के समापन पर श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीराम की आरती कर प्रसाद ग्रहण किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और गुरु वचनों का श्रवण कर आध्यात्मिक लाभ प्राप्त किया।