भोपाल। मध्यप्रदेश में राजभवन के निर्देशों को सरकारी तंत्र द्वारा ठंडे बस्ते में डालने का मामला सामने आया है। राज्यपाल मंगू भाई पटेल द्वारा आदिवासी अंचलों में हुए विकास कार्यों को लेकर मांगी गई महत्वपूर्ण रिपोर्ट पर जल संसाधन विभाग पिछले दो महीनों से कुंडली मारकर बैठा है। इसे लेकर अब प्रशासनिक हलकों में चर्चा तेज हो गई हैं।
राजभवन ने लिखा पत्र, 2 महीने से कोई जवाब नहीं
जानकारी के अनुसार, राज्यपाल मंगू भाई पटेल ने आदिवासी और अनुसूचित क्षेत्रों में प्रशासन द्वारा किए गए विकास कार्यों की समीक्षा के लिए रिपोर्ट मांगी थी। इसके तहत अप्रैल महीने में राजभवन की तरफ से जल संसाधन विभाग की प्रमुख अभियंता को एक आधिकारिक पत्र भेजा गया था। पत्र में विशेष रूप से आदिवासी अंचलों में जल जीवन मिशन और पानी की आपूर्ति के संबंध में किए गए कार्यों की विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई थी। दो महीने से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी विभाग के 116 मुख्य अभियंताओं (Chief Engineers) ने अब तक यह रिपोर्ट राजभवन नहीं भेजी है।
सरकार और संचनालय के पत्रों को भी किया दरकिनार
राजभवन की अनदेखी के बाद जून महीने में जनजाति क्षेत्रीय विकास योजना के संचनालय के साथ-साथ मध्य प्रदेश शासन ने भी विभाग को इस संबंध में पत्र लिखकर जल्द रिपोर्ट भेजने के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद अधिकारियों की तरफ से रिपोर्ट को लेकर कोई तत्परता नहीं दिखाई गई। 95% बजट ठिकाने लगा, लेकिन ‘हितग्राहियों’ की जानकारी गायब
इस पूरे मामले में जल संसाधन विभाग की कार्यप्रणाली पर इसलिए भी बड़े सवाल उठ रहे हैं क्योंकि बजट खर्च करने में विभाग ने गजब की फुर्ती दिखाई है
बजट का 95 प्रतिशत हिस्सा खर्च
पिछले 1 साल के भीतर जल संसाधन विभाग ने आदिवासी क्षेत्रों में 38 परियोजनाओं पर अपने 116 अधिकारियों के जरिए करीब 1,085 करोड़ रुपये खर्च कर दिए हैं। विभाग 1 साल के भीतर आवंटित किए गए बजट का 95 प्रतिशत हिस्सा खर्च भी कर चुका है। राज्यपाल ने अपने पत्र में स्पष्ट रूप से पूछा था कि इन करोड़ों की परियोजनाओं से धरातल पर कितने हितग्राहियों (आदिवासी परिवारों) को वास्तविक लाभ मिला है। अब बजट तो लगभग पूरा साफ हो चुका है, लेकिन हितग्राहियों को लाभ मिला या नहीं, इसकी रिपोर्ट राजभवन को न भेजना विभाग की घोर लापरवाही और मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करता है।