भोपाल। प्रदेश की नगरीय प्रशासन राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण-पत्र विवाद में राज्य स्तरीय छानबीन समिति ने उन्हें नोटिस जारी किया है। समिति ने मंत्री बागरी को 6 जुलाई को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के निर्देश दिए हैं।
मंत्री बागरी से कहा गया है कि छानबीन समिति के समक्ष उपस्थित होने के दौरान वे वर्ष 1950 की स्थिति के अनुसार सतना (मध्य प्रदेश) के निवासी होने तथा स्वयं को बागरी अनुसूचित जाति का सदस्य होने संबंधी प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करें। इसके लिए सभी आवश्यक दस्तावेज छानबीन समिति के समक्ष पेश करने होंगे।
जनजातीय कार्य विभाग के आयुक्त कार्यालय ने यह नोटिस मंगलवार को जारी किया है। यह नोटिस बागरी के जाति प्रमाण-पत्र को लेकर की गई शिकायत पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा छानबीन समिति को 60 दिन के भीतर प्रमाण-पत्र की वैधता पर निर्णय लेने के निर्देश दिए जाने के मद्देनजर जारी किया गया है। इस नोटिस के बाद राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी का जाति प्रमाण-पत्र विवाद एक बार फिर चर्चा में आ गया है।
इससे पहले हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने याचिकाकर्ता एवं एससी कांग्रेस के अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार की याचिका पर यह आदेश दिया था। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि छानबीन समिति संबंधित पक्ष को बुलाकर निर्धारित प्रक्रिया के तहत जांच करेगी और यह तय करेगी कि प्रतिमा बागरी के पक्ष में जारी अनुसूचित जाति (एससी) का प्रमाण-पत्र वैध है या नहीं। जांच पूरी होने के बाद समिति उचित आदेश पारित करेगी।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि यदि 30 जून 2026 तक समिति कोई निर्णय नहीं लेती है, तो याचिकाकर्ता को इस याचिका को पुनर्जीवित (रिवाइव) कराने की स्वतंत्रता होगी।
याचिका में आरक्षण का गलत लाभ लेकर चुनाव जीतने का आरोप
कांग्रेस नेता प्रदीप अहिरवार ने याचिका दायर की थी। जिसमें आरोप लगाया गया कि प्रतिमा बागरी ने गलत तरीके से अनुसूचित जाति का प्रमाण-पत्र बनवाकर आरक्षण का लाभ लिया और उसी आधार पर सतना जिले की रैगांव विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर मंत्री पद हासिल किया।
याचिकाकर्ता का दावा है कि बागरी जाति संबंधित क्षेत्र में अनुसूचित जाति की सूची में शामिल नहीं है और मंत्री वास्तव में राजपूत/ठाकुर समुदाय से संबंध रखती हैं। याचिका में 1961 और 1971 की जातिगत जनगणना, 2003 की राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति के फैसले और 2007 के केंद्र सरकार के राजपत्र का हवाला देते हुए कहा गया है कि ‘बागरी’ को एससी श्रेणी में शामिल नहीं किया गया है।
कोर्ट को यह भी बताया गया कि याचिकाकर्ता ने पहले भी इस मामले में याचिका दायर की थी, जिसे बाद में वापस ले लिया गया था। अब नए दस्तावेजों और तथ्यों के साथ दोबारा याचिका प्रस्तुत की गई थी।