इंदौर। इंदौर में मास्टर प्लान-2047 लागू होने से पहले ही कॉलोनियों को लेकर बड़ा विवाद सामने आ गया है। आरोप है कि जिस धारा-16 के तहत शासन ने वर्षों पहले रोक लगा दी थी, उसी धारा का सहारा लेकर कॉलोनी सेल ने चार कॉलोनियों के करीब 44 एकड़ जमीन के प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब शासन की स्पष्ट रोक लागू थी, तब आखिर यह अनुमति किस आधार पर जारी कर दी गई?
सूत्रों के मुताबिक, इंदौर के आगामी मास्टर प्लान-2047 में 79 गांव निवेश क्षेत्र में शामिल किए गए हैं। इसके बाद 1 जनवरी 2022 से करीब 95 हजार एकड़ जमीन को लैंड पूलिंग के दायरे में लाया गया, जबकि 30 हजार एकड़ जमीन पहले ही ग्रीन जोन घोषित हो चुकी थी। ऐसे में शासन ने धारा-16 के तहत नई अनुमतियों पर रोक लगाई थी ताकि मास्टर प्लान प्रभावित न हो। लेकिन इसी बीच कॉलोनाइजरों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
कैसे विवादों में आया मामला ?
हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने अपने आदेश में साफ कहा कि संबंधित प्रकरणों में कानून और नियमों के अनुसार निर्णय लिया जाए। अदालत ने कहीं भी यह नहीं कहा कि हर हाल में अनुमति देना अनिवार्य है। अदालत ने केवल सक्षम प्राधिकारी को नियमों के तहत फैसला लेने का निर्देश दिया था। यहीं से पूरा मामला विवादों में आ गया। आरोप है कि कॉलोनी सेल ने कोर्ट के आदेश की ऐसी व्याख्या की कि चार कॉलोनियों के प्रोजेक्ट को मंजूरी जारी कर दी गई।
मंजूरी देने का अधिकार था ?
बताया जा रहा है कि सांवेर तहसील के मुरायटा समेत कई सर्वे नंबरों की करीब 44 एकड़ जमीन पर विकास की अनुमति दे दी गई। अब सवाल यह उठ रहा है कि जब शासन की रोक लागू थी तो क्या कॉलोनी सेल को इतनी बड़ी मंजूरी देने का अधिकार था? जानकारों का कहना है कि यदि नियमों के अनुसार परीक्षण किया जाता तो कई मामलों में अनुमति रोकी भी जा सकती थी। लेकिन जिस तेजी से फाइलों का निपटारा हुआ, उसने पूरी प्रक्रिया पर संदेह खड़ा कर दिया है। यही वजह है कि अब कॉलोनी सेल की कार्यप्रणाली और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं।
एचसी के आदेश की आड़ में सरकार की मंशा दरकिनार
मामले की एक और अहम कड़ी यह है कि पूर्व मुख्य सचिव अनुराग जैन ने धारा-16 के तहत हो रहे कथित खेल पर रोक लगाने के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद यदि प्रतिबंधित क्षेत्र में अनुमतियां जारी हुई हैं, तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि गंभीर जवाबदेही का विषय बन सकता है। अब इस पूरे घटनाक्रम को लेकर यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या हाईकोर्ट के आदेश की आड़ लेकर शासन की मंशा को दरकिनार किया गया?
क्या नियमों की व्याख्या को अपने हिसाब से मोड़कर कॉलोनाइजरों को राहत पहुंचाई गई? और यदि ऐसा हुआ है तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? फिलहाल यह मामला प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। यदि आरोपों की पुष्टि होती है तो कॉलोनी सेल के अधिकारियों की भूमिका की जांच, मंजूरियों की वैधता और पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष समीक्षा की मांग तेज होना तय माना जा रहा है।