जबलपुर। मध्य प्रदेश के अनुदान प्राप्त (Aided) स्कूलों के शिक्षकों को 7वें वेतनमान का लाभ न दिए जाने के मामले में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाया है। याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को अपना जवाब दाखिल करने के लिए अंतिम अवसर प्रदान किया है। अदालत ने चेतावनी दी है कि यदि निर्धारित समय-सीमा के भीतर आदेश का पालन नहीं किया गया, तो प्रमुख सचिव (स्कूल शिक्षा) और आयुक्त (लोक शिक्षण) सहित अन्य संबंधित वरिष्ठ अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में हाजिर होना पड़ेगा।
जस्टिस दीपक खोट की बैंच में हुई सुनवाई
यह सख्त आदेश मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के जस्टिस दीपक खोट की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान जारी किया। जबलपुर निवासी शिक्षक राजेन्द्र तिवारी ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर अनुदान प्राप्त शिक्षकों को 7वें वेतनमान का लाभ दिए जाने की मांग की है। याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता रोहिणी प्रसाद तिवारी ने तर्क दिया कि प्रदेश के अनुदान प्राप्त शिक्षक पिछले 10 वर्षों से 7वें वेतनमान के लाभ का इंतजार कर रहे हैं। अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि सरकार की ओर से बार-बार समय लिए जाने के बावजूद न तो जवाब पेश किया जा रहा है और न ही अदालत के आदेशों का पालन किया जा रहा है, जिससे शिक्षकों में भारी निराशा है।
अगली सुनवाई 14 दिसंबर से शुरू होने वाले सप्ताह में
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने राज्य शासन के ढुलमुल रवैये पर नाराजगी जताई है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगली सुनवाई तक यदि आदेश का पालन रिपोर्ट या संतोषजनक जवाब दाखिल नहीं किया गया, तो स्कूल शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव और लोक शिक्षण आयुक्त को स्वयं अदालत में उपस्थित होकर स्पष्टीकरण देना होगा। मामले की अगली सुनवाई 14 दिसंबर से शुरू होने वाले सप्ताह में नियत की गई है। हाईकोर्ट के इस सख्त रुख के बाद अब प्रदेश के हजारों अनुदान प्राप्त शिक्षकों में 7वें वेतनमान का लाभ मिलने की उम्मीद जाग उठी है, वहीं प्रशासनिक महकमे में जवाब तैयार करने की सरगर्मी बढ़ गई है।