ग्वालियर। पूरे देश में दीपावली के पावन पर्व और रूप चौदस के दिन जहां हर घर-आंगन दीपों की रोशनी से जगमगा उठता है और खुशियां मनाई जाती हैं, वहीं मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक शहर ग्वालियर में एक ऐसा अनूठा और दुर्लभ मंदिर है, जहां इस दिन अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति पाने के लिए मृत्यु के देवता यमराज की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। फूलबाग स्थित लगभग 250 साल से अधिक पुराने मारकंडेश्वर मंदिर की देश के उन विरले धार्मिक स्थलों में गिनती होती है, जहां भगवान शिव और मार्कंडेय ऋषि के साथ साक्षात यमराज भी विराजमान हैं।
सिंधिया राजवंश के काल का है ढाई सौ साल पुराना इतिहास
ग्वालियर के फूलबाग क्षेत्र में स्थित यह प्राचीन मारकंडेश्वर मंदिर अपनी ऐतिहासिक और धार्मिक महत्ता के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। इतिहास के पन्नों के अनुसार इस मंदिर की स्थापना सिंधिया राजवंश के शासनकाल के दौरान हुई थी। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां गर्भगृह में भगवान शिव, अमरता का वरदान पाने वाले मार्कंडेय ऋषि और यमराज की प्रतिमाएं एक साथ स्थापित हैं। यही कारण है कि इसे देश के इकलौता ऐसा मंदिर माना जाता है, जहां रूप चौदस के अवसर पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है और यमराज के दरबार में शीश नवाकर अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति की कामना की जाती है।
क्या है पौराणिक कथा और प्रतिमा का रहस्य?
इस मंदिर की स्थापना और यहां यमराज की पूजा के पीछे एक बेहद गहरी पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। हिंदू पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, मार्कंडेय ऋषि की कुल आयु मात्र 12 वर्ष ही निर्धारित थी। जब उनकी आयु पूरी होने पर यमराज उनके प्राण लेने के लिए पहुंचे, तो उस समय बालक मार्कंडेय भगवान शिव के शिवलिंग से लिपट गए और पूरी श्रद्धा से उनकी शरण में चले गए। भक्त की पुकार सुनकर भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने यमराज से अपने भक्त के प्राणों की रक्षा की।
मंदिर में स्थापित मुख्य प्रतिमा इसी पौराणिक प्रसंग को जीवंत करती है। इस प्रतिमा में महर्षि मार्कंडेय भगवान शिव के शिवलिंग को मजबूती से पकड़े हुए दिखाई देते हैं, जबकि ठीक उनके सामने मृत्यु के देवता यमराज की प्रतिमा विराजमान है।
दक्षिण दिशा में सरसों के तेल का दीपक जलाने की है परंपरा
रूप चौदस यानि नरक चतुर्दशी के दिन इस मंदिर में विशेष धार्मिक विधान और पूजा-अर्चना की जाती है। मान्यता है कि इस खास दिन यमराज की उपासना करने से वे प्रसन्न होते हैं और भक्तों को अकाल मृत्यु के भय तथा जीवन के कष्टों से मुक्ति का वरदान मिलता है।
दक्षिण दिशा का महत्वः शास्त्रों में दक्षिण दिशा को यमराज की दिशा माना गया है। रूप चौदस की शाम को इस मंदिर में श्रद्धालु विशेष रूप से दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके सरसों के तेल का दीपक प्रज्वलित करते हैं। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से दीपक जलाने और यमराज का पूजन करने से परिवार में अकाल मृत्यु का संकट टल जाता है और सुखद, दीर्घायु जीवन की प्राप्ति होती है।
आस्था, पौराणिक कथाओं और ग्वालियर के समृद्ध इतिहास को अपने भीतर समेटे यह प्राचीन मारकंडेश्वर मंदिर रूप चौदस के पर्व पर एक अलग ही आध्यात्मिक ऊर्जा से भर जाता है। जहाँ एक तरफ पूरा देश दीपावली के दीप जला रहा होता है, वहीं इस मंदिर में जलने वाले दीप यमराज की कृपा पाने और मृत्यु के भय से मुक्ति का संदेश देते हैं।