नीमच। संसार के दुखों से मुक्ति प्राप्त करना है तो परमात्मा की शरण में जाना चाहिए। यदि हमारा परमात्मा के प्रति समर्पण बढ़ेगा तो संसार के प्रति समर्पण कम होगा। आत्मा संसार के संपर्क में आने से संसार से जुड़ गई है यदि हम परमात्मा के संपर्क में आएंगे तो परमात्मा से जुड़ कर अपना तथा दूसरों का कल्याण कर सकते हैं। पवित्र घ्भावना से परमात्मा की पूजा के बिना जीवन अधूरा होता है। यह बातश्री जैन श्वेतांबर भीड़भंजन पार्श्वनाथ मंदिर ट्रस्ट श्री संघ नीमच के तत्वावधान में बंधू बेलडी पूज्य आचार्य श्री जिनचंद्र सागरजी मसा के शिष्य रत्न नूतन आचार्य श्री प्रसन्नचंद्र सागरजी मसा ने कही।
वे चातुर्मास के उपलक्ष्य में मिडिल स्कूल मैदान के समीप जैन भवन में आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि पवित्र भावना के साथ मन में विनय विवेक हो तो परमात्मा का ज्ञान प्राप्त हो सकता है। परमात्मा की भक्ति करते समय कपड़े सिले हुए नहीं पहनना चाहिए।पूजा के कपड़े से हाथ मुंह नहीं पोछना चाहिए।प्राचीन काल में धर्म कम था लेकिन जीव दया जाता थी ।आज धर्म ज्यादा है लेकिन जीव दया कम है चिंतन का विषय है।पहले कोई व्यक्ति 8 वर्ष की तपस्या करता है तथा पूरा गांव प्रसन्न होकर जुलूस निकालता था। प्राचीन काल में महिलाएं पति का नाम नहीं देती थी आज तू शब्द का उपयोग बढ़ने के बाद पति पत्नी में तू तू में में अधिक बढ़ रही है ।व्यवहार खराब हो रहा है। महिलाएं कम कपड़े पहन कर अश्लील अंग प्रदर्शन कर रही है और संस्कार हीनता बढ़ रही है इसी कारण परिवारों में तलाक की संख्या बढ़ रही है चिंतन का विषय है।परिवारों का विघटन रोकना है तो हमें बच्चों को बचपन से ही धार्मिक संस्कार से जोड़ना होगा। बेटे और बेटी दोनों को धार्मिक पाठशाला में समानता के साथ नारी शक्ति का आदर सम्मान करने के संस्कार की शिक्षा भी देनी होगी तभी नारी जाति पर अत्याचार रुक सकेगा। युवा वर्ग जिन्हें धार्मिक संस्कारों की अधिक आवश्यकता है वे तो प्रवचन में कम दिखते हैं चिंतन का विषय है यदि युवा वर्ग धार्मिक प्रवचन और संस्कार ग्रहण करेंगे तो पारिवारिक विघटन की परिस्थितियां कभी नहीं आएगी। यदि हमारे घर पर महत्वपूर्ण व्यक्ति प्रधानमंत्री या वह व्यक्ति आने वाला हो जिसने हमें सहायता कर सफलता के शिखर पर पहुंचाया है तो हम उसके स्वागत के लिए समर्पण भाव से आगे आएंगे लेकिन हमको सब कुछ देने वाला परमात्मा के मंदिर जाते समय ऐसे अच्छे भाव हमारे मन में क्यों नहीं आते हैं चिंतन का विषय है।परमात्मा के मंदिर जाते समय हमें भी इतने ही अच्छे भाव लाने होंगे तभी पुण्य फल कर्म बढ़ेगा और हमारी आत्मा का कल्याण हो सकता है। हमें मंदिर दर्शन करने जाना है तो हमारे मन में मंदिर जाने के मार्ग और मंदिर प्रतिमा का दृश्य आएगा और हमारे शरीर से पहले हमारा मन मंदिर पहुंच जाए तो हम समझ जाएं कि हमारा परमात्मा के प्रति समर्पण भाव है।
श्री संघ अध्यक्ष अनिल नागौरी ने बताया कि धर्मसभा में तपस्वी मुनिराज श्री पावनचंद्र सागरजी मसा एवं पूज्य साध्वीजी श्री चंद्रकला श्रीजी मसा की शिष्या श्री भद्रपूर्णा श्रीजी मसा आदि ठाणा 4 का भी चातुर्मासिक सानिध्य मिला।पूज्य आचार्य भगवंत का आचार्य पदवी के बाद प्रथम चातुर्मास नीमच में हो रहा है। उपवास, एकासना, बियासना, आयम्बिल, तेला, आदि तपस्या के ठाठ लग रहे है। धर्मसभा में जावद ,जीरन, मनासा, नयागांव, जमुनिया,जावी, आदि क्षेत्रों से श्रद्धालु भक्त सहभागी बने।धर्मसभा का संचालन सचिव मनीष कोठारी ने किया।