चित्तौड़गढ़। गांधीनगर स्थित नानू नवकार भवन में आयोजित धर्म सभा में जिज्ञासुओं को सम्बोधित करते हुए शांतक्रांति संघ की विदुषी महासती शीलप्रभा ने कहा कि संसारी व्यक्ति को अपने अन्दर रही हुई कमियां नज़र नहीं आती है और वह दूसरों के दोषों को देख कर उनकी कमियां गिनाने में अपना कीमती समय बर्बाद करता रहता है। उसका स्वभाव ही ऐसा हो जाता है कि सुविधाओं और अनुकूलताओं में भी उसे कमियां नज़र आती है जब कि दुसरी ओर जो संयमी साधक होते हैं वे प्रतिकूलताओ और विषम परिस्थितियों में भी अनुकूलता का अनुभव करने वाले होकर समभाव की साधना में मस्त रहते हैं और उनका मन शांत रहने के कारण वे मुनि अथवा संत, सती की उत्तम श्रेणी में होकर जन मानस के लिए पूजनीय बन जाते हैं। जहां संसारी व्यक्ति विषय कषायो में उलझ कर अपना चौरासी का परिभ्रमण बढ़ाता है वहीं संयमी साधक की कषाय मंद, विषय वासना बंद और आराधना बुलंद होने के कारण वो अपना संसार सीमित कर लेता है। इससे पूर्व महासती सत्यप्रभा ने बताया कि माता पिता को चाहिए कि संतान जब युवा हो जाय तो उसको संसार रूपी दावानल में उलझाने के बजाय संयम मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देकर आत्मकल्याण में सहयोगी बने। चतुर्मास शुरु होने के बाद अब तक सुनीता रांका, शीतल सरुपरिया, कलाबाई भड़कत्या, पारस मल सोनी, योगेश चोपड़ा, सुरेश लोढ़ा एवम् मूलचंद बाघमार ने तेले तप की तपस्या की है जिनकी तपस्या की धर्म सभा में उपस्थित सभी जनों द्वारा खूब खूब अनुमोदना की गई। तेले तप के सभी तपस्वीयों का शांतक्रांति संघ के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष हेमंत कोठारी निवासी भीलवाड़ा की तरफ़ बहुमान किया गया। संचालन संघ मंत्री इंद्रेश कोठारी ने किया।