चित्तौड़गढ़। गांधीनगर स्थित नानू नवकार भवन में आयोजित धर्म सभा में प्रवचन करते हुए शांतक्रांति संघ की विदुषी महासती शीलप्रभा ने बताया कि तीर्थंकर बनने वाली आत्मा इस धरा पर जन्म लेने के बाद साधना के द्वारा कठिन परिषह एवम् उपसर्गों को समभाव पूर्वक सहन करते हुए अपनी आत्मा से ज्ञानवरणीय,दर्शनावरणीय, मोहनीय और अंतराय कर्मों के आवरण को छिन्न भिन्न करके केवल ज्ञान, केवल दर्शन प्राप्त कर लेती है उसके बाद उन्हें सारा संसार एवम् इसमें रही हुई सब वस्तुएं अपने ज्ञान से नज़र आने लगती है। जब वे संसारी जीवों के दुखों को अपने ज्ञान से देखते हैं तो उनके अंतर में अनंत करुणा का भाव उमड़ता है और उनके दुखों को दूर करने एवम् मुक्ति का रास्ता बताने हेतु जिनवाणी के रुप में देशना फरमा कर इस दुःख से भरे संसार सागर को पार करने का रास्ता बता कर उस रास्ते पर चलने की प्रेरणा देते हैं जिस पर चल कर कई भव्य आत्माएं अपना कल्याण करती है। तीर्थंकर प्रभु सबसे बडे़ निर्ग्रंथ होते हैं और उनके निर्ग्रंथ प्रवचन तीनों लोकों में सदा सत्य होते हैं इस कारण हमें उन पर सच्ची श्रध्दा रख कर आचरण में लाना चाहिए। इससे पूर्व साध्वी सत्यप्रभा ने कहा कि हम सब को भी मन, वचन और काया की एकाग्रता के साथ प्रभु भक्ति में संलग्न होकर मुक्ति मंज़िल की ओर बढते रहना चाहिए। साध्वी रत्ना राजश्री जी म सा द्वारा माणक लाल सिपानी को तेले तप एवम् अन्य प्रत्याख्यान ग्रहण कराए गए। धर्म सभा में स्थानीय सुज्ञ श्रावक श्राविकाओं के साथ कोटड़ी संघ के धर्मावलंबी भी उपस्थित रहे। संचालन इंद्रेश कोठारी ने किया।