रतलाम। देश जहां डिजिटल इंडिया की ओर बढ़ रहा है, वहीं देश में अभी भी कई ऐसे गांव है जहां पर पुरानी मान्यताओं को प्राथमिकता दी जा रही है। इन परंपराओं व मान्यताओं को अगर कोई बदलने की कोशिश करता है तो उस परिवार को जनहानि का सामना करना पड़ता ऐसे में इस प्रकार की रूढ़िवादिता को कोई समाप्त करने के लिए युवा पीढ़ी भी आगे नहीं आ रही है। हम बात कर रहे हैं। रतलाम जिले की ताल तहसील के ग्राम कछालिया की। जहां पर भले ही सैकड़ों नए मकान बन चुके है। लेकिन उन मकानों पर किसी प्रकार का रंगरोगन नहीं किया गया है। निर्मित मकानों पर दीपावली पर्व या मांगलिक कार्य के दौरान भी किसी प्रकार का रंग नहीं चढ़ता है। अगर किसी ने गलती से ऐसा कर लिया तो जनहानि का डर बना रहता है। गांव कछालिया में सदियों से यह परंपरा चली आ रही है पूरे गांव में मवेशियों पर तथा किसी भी प्रकार के काले कलर के जूतों व काले कपड़ों का उपयोग नहीं किया जाता है। इधर दीपावली पर्व को एक दिन बाकी ह। गांव में अनेक आधुनिक डिजाइनों के मकान बन चुके है, परंतु आधुनिक डिजिटल के इस युग में गांव में रंग रोगन व पुताई नहीं हुई है।
भैरव बावजी व कालेश्वर के चलते प्रसिद्ध-
यह गांव भगवान कालेश्वर के नाम से प्रसिद्ध है। भैरव बावजी तथा कालेश्वर भगवान की प्रसिद्धता व चमत्कार मानते है। इस मंदिर के सामने से घोड़ी निकासी नहीं होती है। लोग काले जूते व काले कपड़े भी नहीं पहनते हैं। इस रूढिवादिता कब से क्यों शुरू हुई इस बारे में कोई भी बताने को तैयार नहीं है। गांव के बुजुर्ग बताते द्वारा बताया कि हमारे पूर्वज और परिवार के लोगों द्वारा बताई गई बातों के आधार पर हम काम करते हैं। उनका कहना था कि कभी भी दीपावली या अन्य मांगलिक कार्य के दौरान मकान की रंगाई पुताई नहीं करे, नहीं तो जनहानि हो सकती है, ऐसे में इससे बचे। उनका कहना था कि इस परंपरा को अगर किसी ने तोडऩे की कोशिश की तो उनके परिवार में जनहानि हो जाने के बाद किसी ने साहस नहीं किया। परंतु दीपावली की खुशियां मनाते हुए आतिशबाजी जरूर करतेे हैं।
वर्षाे से चली आ रही परंपरा-
ग्रामीणों ने चर्चा दौरान बताया कि गांव में जो मंदिर है वह गांव के आसपास के क्षेत्रों से लोग भैरव मंदिर की पूजा अर्चना करने आते हैं, मन्नतें पूरी होने पर पूर्णिमा पर विशेष हवन पूजन किया जाता है। काल भैरव मंदिर से जुड़ी कई मान्यताएं सदियों से चली आ रही है किसी के घर में परिवार में शादी समारोह से लेकर जन्म पर उस परिवार के मुखिया का सिर इस मंदिर के पहले द्वार पर झुकता है उनकों नमन करने के बाद गणेश पूजन और अन्य कार्य होते हैं।