भोपाल। केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के भोपाल परिसर में आज (9 जनवरी 2025) से प्रारंभ हुआ क्षेत्रीय रूपक महोत्सव दर्शकों को भारतीय संस्कृति की विभिन्न रंगों से रूबरू करवा रहा है। इस महोत्सव में देशभर से आए दस नाट्य दल संस्कृत में नाटक प्रस्तुत कर रहे हैं, जिनमें जयपुर, भीलवाड़ा, नागपुर, नासिक, दिल्ली, भोपाल सहित कई अन्य स्थानों के दल शामिल हैं।
उद्घाटन समारोह में आए कई प्रतिष्ठित अतिथि
कार्यक्रम के संरक्षक प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी (कुल गुरु, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली) हैं। इस महोत्सव का उद्घाटन केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय भोपाल परिसर के निदेशक प्रो. रमाकांत पांडेय ने किया। समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी(पूर्व कुलपति, राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली) उपस्थित थे। अन्य प्रमुख अतिथियों में प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी (निदेशक, भारत अध्ययन केंद्र, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी) और प्रो. नीलाभ तिवारी (सह निदेशक, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय भोपाल) शामिल थे।
संस्कृत नाट्य का महत्व और समकालीन मुद्दों पर चर्चा
प्रो. नीलाभ तिवारी ने उद्घाटन सत्र में कहा कि भारत एक विविध संस्कृतियों का देश है और इस महोत्सव में दर्शकों को इसकी झलक मिलेगी। वहीं प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी ने नाटकों के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि नाट्य जीवन के चारों पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) को प्राप्त करने का साधन है।
नाटकों में समकालीन मुद्दों का सजीव चित्रण
महोत्सव के पहले दिन कई महत्वपूर्ण नाटक प्रस्तुत किए गए। इनमें से एक नाटक ष्मंत्रदानमष् में एक दस्यु के सज्जन पुरुष बनने की कहानी दिखाई गई, तो वहीं ष्धारित्रीपतिनिवार्चनष् ने कन्या के लिए सुयोग्य वर का चयन करने की समस्या को मंच पर जीवंत किया। ष्दीपदानमष् नाटक में राजस्थान के गौरव को प्रदर्शित करते हुए पन्नाधाय के राज्य के प्रति समर्पण की भावनाएं व्यक्त की गई। ष्मंजुलाष् नाटक ने नारी सम्मान और उत्थान की बात की, जबकि ष्महिममयभारतमष् ने देश की नदियों के महात्म्य का वर्णन किया।
इन सभी नाटकों ने दर्शाया कि संस्कृत नाट्य केवल अतीत की परंपराओं को ही नहीं, बल्कि समकालीन समाज की समस्याओं और आदर्शों को भी उजागर करते हैं। इस महोत्सव के माध्यम से संस्कृत नाटकों का पुनरुद्धार और जनमानस में उनकी प्रासंगिकता को बढ़ावा देने का कार्य किया जा रहा है। आस्था और प्रदीप चोपड़ा का ध्रुपद गायन ने महोत्सव में एक विशेष रंग भरते हुए सभी का मन मोह लिया।