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July 10, 2026, 10:29 am
KHABAR : स्कूल चलें हम के दावों की खुली पोल, शहडोल में सामुदायिक भवन और रंगमंच में गैस सिलेंडर, खुले कुएं के साए में पढ़ने को मजबूर देश का भविष्य, पढे़ खबर 

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शहडोल। सरकार हर साल स्कूल चलें हम के नारे लगाती हैं, करोड़ों का बजट पास होता है और कागजों पर चमचमाती व्यवस्थाओं की तस्वीरें पेश की जाती हैं। लेकिन जैसे ही नया शैक्षणिक सत्र शुरू होता है, जमीनी हकीकत इन दावों की धज्जियां उड़ा देती है। कुछ ऐसी ही हैरान करने वाली और व्यवस्था के मुंह पर करारा तमाचा मारती तस्वीर सामने आई है मध्य प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य शहडोल जिले से, यहाँ बुढार विकासखंड के  शासकीय माध्यमिक विद्यालय अतरिया में देश का भविष्य किसी सर्वसुविधायुक्त स्कूल भवन में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक मंच और सामुदायिक भवन में कक्षाएं लग रही हैं।


सबसे चिंताजनक बात यह है कि जिस कमरे में बच्चे पढ़ रहे हैं, वहीं गैस सिलेंडर रखकर मध्यान्ह भोजन भी तैयार किया जा रहा है। सामुदायिक भवन और रंगमंच में शिक्षा ग्रहण के रहे देश का भविष्य भवन के लिए जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों से गुहार लगा रहे है.


आदिवासी बाहुल्य  शहडोल संभाग के बुढार विकासखंड के  शासकीय माध्यमिक विद्यालय अतरिया में कक्षा 1 से 8 तक के बच्चे किसी स्कूल में नहीं, बल्कि खतरों के साए में पढ़ रहे हैं, कहने को को विद्यालय भवन है। लेकिन जर्जर होने के कारण छात्रों को सामुदायिक भवन और खुला सांस्कृतिक मंच में शिक्षा ग्रहण करने मजबूर है,सबसे बड़ा खतरा उस सामुदायिक भवन में है।  


जहां बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं और उसी कमरे में गैस सिलेंडर रखकर मध्यान्ह भोजन तैयार किया जा रहा है। खुले स्थान पर मौजूद कुआं भी बच्चों के लिए खतरे का कारण बना हुआ है। बरसात में फिसलन, जलभराव और खुले में पढ़ाई की समस्या बच्चों की मुश्किलें और बढ़ा सकती है। सामुदायिक भवन और रंगमंच में शिक्षा ग्रहण के रहे देश का भविष्य भवन के लिए जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों से गुहार लगा रहे है३


देश का भविष्य कहे जाने वाले बच्चे पढ़ाई नहीं कर रहे, बल्कि हर दिन अपनी जान की बाजी लगा रहे हैं। जिस कमरे में मासूम बच्चे बैठकर ककहरा सीख रहे हैं, ठीक उसी कमरे में मिड-डे मील का भोजन तैयार करने के लिए गैस सिलेंडर रखा गया है। ​सोचिए एक बंद कमरा, दर्जनों मासूम बच्चे और वहीं धधकती आग के साथ रखा गैस सिलेंडर, एक छोटी सी लापरवाही या तकनीकी चूक किसी भी वक्त बड़े हादसे को दावत दे सकती है। ​जो बच्चे कमरे के अंदर नहीं समा पाते, उन्हें बाहर सांस्कृतिक मंच पर खुले आसमान के नीचे बिठाया जाता है। इस खुले मंच के ठीक बगल में एक खुला हुआ गहरा कुआं है। खेलते-कूदते या असावधानीवश किसी बच्चे का पैर फिसला नहीं कि बड़ा हादसा तय है।


जब इस खौफनाक जमीनी हकीकत पर शहडोल के जिला परियोजना समन्वयक (क्च्ब्) से जवाब मांगा गया, तो उन्होंने जो आंकड़े पेश किए, वे शिक्षा विभाग की रीढ़ विहीन व्यवस्था को पूरी तरह बेनकाब करते बताया कि जिले में 10 स्कूल निजी भवनों में संचालित हो रहे हैं। 15 नव-निर्मित भवनों में स्कूल चल रहे हैं, 41 स्कूल भवनों में सुधार कार्य की जरूरत है और 20 स्कूलों के निर्माण का प्रस्ताव डीएमएफ मद से है। जिले में 83 भवन पूरी तरह जर्जर और संचालन योग्य नहीं हैं, जबकि 646 जर्जर भवनों की मरम्मत की आवश्यकता  है।


अतरिया विद्यालय की तस्वीर केवल एक स्कूल की समस्या नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की प्राथमिकताओं का आईना है। जिन बच्चों के हाथों में किताबें और भविष्य के सपने होने चाहिए, वे गैस सिलेंडर, खुले कुएं और असुरक्षित कक्षाओं के साए में पढ़ने को मजबूर हैं। अब देखना यह है कि जिम्मेदार विभाग कब जागता है और इन बच्चों को सांस्कृतिक मंच से निकालकर सुरक्षित स्कूल भवन उपलब्ध कराता है।

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