देवास। शीतला सप्तमी का पर्व देश के अलग-अलग राज्यों में मनाया जाता।देश के कुछ हिस्सों में सप्तमी के दिन और कुछ हिस्सों में अष्टमी तिथि के दिन माता शीतला की पूजा की जाती है।होली के सात दिन बाद यह पर्व मनाया जाता है,जिसे बसौड़ा भी कहा जाता है। आज सुबह से ही महिलाएं स्नान ध्यान कर माता शितला की पुजा करने के लिए पहुंचीं।जहा शीतला माता की पूजा कर सुख समृद्धि की कामना की।ऐसी मान्यता है कि शीतला माता की पूजा अर्चना करने से बुखार, खसरा आदि अन्य संक्रमणों से बचाव होता है। इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता है।बासी भोजन का भोग शीतला माता को अर्पित किया जाता है,जो एक दिन पहले तैयार किया जाता है।साथ ही बासी खाना खाया जाता है। शीतला माता को ठंडक प्रदान करने वाली देवी भी माना जाता है,और उनका पूजन खासकर ग्रीष्मकाल के आगमन से पहले किया जाता है, ताकि शरीर में ठंडक बनी रहे और त्वचा संबंधित बीमारियों से बचाव हो सके। महिलाओं ने बताया की पौराणिक कथा के अनुसार राजस्थान में माता शितला एक महिला का रुप धारण कर धरती पर आई थी ओर घुमने लगी।इस दोरान किसी ने ऊपर से चावल का गर्म पानी निचे फेका जो माता रानी के ऊपर आ गिरा।जिससे माता रानी के शरीर पर बेहद दर्द भरे छाले पड गये।उनके शरीर में जलन होने लगी। इसी दोरान एक कुम्हारन ने माता रानी पर ठंडा पानी डाला और घर मे पडी ठंडी राबड़ी खिलाई। जिससे माता रानी को ठंडक हुई ओर जलन कम हुई। माता शीतला ने कुम्हारन की सेवा से प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया की होली के बाद सप्तमी को भक्ति-भाव से जो पूजा करेगा, ठंडा जल, दही व बासी भोजन का भोग लगाएगा,उसके घर की दरिद्रता दूर होगी एवं पूजा-अर्चना करने वाली स्त्रियों की गोद हमेशा भरी रहेगी। मां उनकी संतानों को निरोगी एवं सुखी जीवन का आशीर्वाद देगी।