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September 13, 2025, 11:13 am
KHABAR : भारत की शिक्षा व्यवस्था संकट में, शिक्षा का हो रहा व्यवसायीकरण, निजी संस्थानों पर नियंत्रण कब? नीमच के पूर्व विधायक संपत स्वरूप जाजू ने उठाया सवाल, पढ़े रतन पंडित की खबर

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नीमच। किसी भी देश के भविष्य निर्माण की नींव उसकी शिक्षा प्रणाली होती है। शिक्षा से ही ज्ञान का विकास होता है और यही विकास किसी राष्ट्र को प्रगति के शिखर तक पहुँचाता है। आज विकसित देशों की सफलता का मूल कारण उनकी मजबूत शिक्षा व्यवस्था है, जिसमें मोंटेसरी से लेकर उच्च शिक्षा और अनुसंधान तक सभी स्तरों को महत्व दिया गया है।

दुर्भाग्यवश भारत आज़ादी के बाद से अब तक कोई ऐसी ठोस शिक्षा नीति विकसित नहीं कर पाया, जिससे बालक से लेकर युवा वर्ग तक सभी को समान रूप से लाभ मिल सके। सरकारी शिक्षा संस्थान तंत्र की कमजोर कार्यशैली के चलते आज आकर्षण खो बैठे हैं। परिणामस्वरूप लोग निजी शिक्षा संस्थानों की ओर रुख कर रहे हैं।

निजी शिक्षा संस्थानों ने शिक्षा को पूर्णतः व्यावसायिक बना दिया है। वे विद्यार्थियों और अभिभावकों से भारी शुल्क तो वसूलते हैं, लेकिन अपेक्षित सुविधाएँ 10 प्रतिशत भी उपलब्ध नहीं कराते। आज ये संस्थान लूट के अड्डे बन चुके हैं और आम जनता की मजबूरी का भरपूर शोषण कर रहे हैं।

चिंताजनक यह भी है कि निजी शिक्षा संस्थानों को अनुसंधान और शोध (R&D) की कोई परवाह नहीं है। शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू ही इन संस्थानों की प्राथमिकता से बाहर है। केंद्र और राज्य सरकारों का इन पर नियंत्रण लगभग नगण्य है। संचालकों को राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त है, जिससे उनका गठजोड़ इतना मजबूत हो गया है कि तोड़ना कठिन है।

भारत में निजी शिक्षा का कारोबार लाखों-करोड़ों रुपये तक पहुँच चुका है, जो सरकार के शिक्षा बजट से कई गुना अधिक है। यह व्यवसाय गाँवों से लेकर महानगरों तक फैला हुआ है। आवश्यक है कि सरकारें निजी शिक्षा संस्थानों पर कठोर नियंत्रण स्थापित करें और अनुसंधान व शोध को अनिवार्य बनाएँ। तभी भारत की शिक्षा व्यवस्था वास्तविक अर्थों में सशक्त और जनहितैषी बन सकेगी।

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