निम्बाहेड़ा। शरद पूर्णिमा के पावन अवसर पर आयोजित श्री राधा कृष्ण मंदिर में महारास महोत्सव में भक्तों पर आनंद की अद्भुत वर्षा हुई। पूज्य गुरुदेव गौनंदन पंडित विकास नागदा के श्रीमुख से महारास की दिव्य कथा का श्रवण कर सभी श्रद्धालु भावविभोर हो गए।
वृंदावन की अनुभूति और महारास का दिव्य स्वरूप कथा के प्रारंभ में, गौनंदन महाराज ने मंगलाचरण के पश्चात श्री राधारानी का स्मरण किया और अपने मन को वृंदावन ले जाने की इच्छा व्यक्त की। उन्होंने मधुर भजन "मन चल रे वृंदावन धाम" गाकर उपस्थित सभी भक्तों को मानो क्षण भर के लिए वृंदावन के साक्षात् दर्शन करा दिए।
महारास की कथा का शुभारंभ करते हुए गौनंदन महाराज ने कहा कि यह लीला कोई साधारण नृत्य नहीं, बल्कि भगवान की साक्षात् प्राप्ति की कथा है। उन्होंने कहा कि अक्सर कुछ लोग इस लीला को गलत नजर से देखते हैं और शंका करते हैं, जबकि भगवान ने गीता में कहा है कि शंका करने वाले का विनाश होता है।
'गोपी' और 'रास' की सही परिभाषा
महाराज जी ने रास लीला शब्द के गलत अर्थ पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इसे मुहावरा बना दिया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि "वास्तव में रास कोई नृत्य नहीं है, यह रस का दिव्य समूह है।"
उन्होंने 'गोपी' शब्द का सही अर्थ बताते हुए कहा कि गोपी कोई स्त्री नहीं, बल्कि वह हैं: गौभि: इन्द्रियै: कृष्ण रसम पिबति इति गोपी" अर्थात् जो अपनी प्रत्येक इंद्रियों से कृष्ण नाम के रस का पान करती है, वह गोपी है। उन्होंने जोर देकर कहा, "स्त्री हो, पुरुष हो, चाहे कोई भी हो, जो कृष्ण प्रेम में डूब गया वो गोपी है। जिसे हर अवस्था में कृष्ण ही कृष्ण दिखाई देते हैं, वो गोपी हैं। केवल दिखावा करना गोपी नहीं है।
महारास: वेदों की ऋचाओं का नृत्य
गौनंदन महाराज ने महारास लीला को गोपियों की उस अद्भुत और अभिभूत कर देने वाली नृत्य व संगीत की अनुपम लीला बताया, जिसमें संदेह होकर विदेह का वर्णन मिलता है। उन्होंने गोपियों को साधारण स्त्रियां न मानकर उन्हें वेद की ऋचाएं (कुल एक लाख ऋचाएं) बताया।
उन्होंने यह भी बताया कि त्रेतायुग में दंडकारण्य वन के ऋषि-मुनियों ने जब भगवान राम को वनवासी के रूप में देखा था, तब उनकी इच्छा हुई थी कि वे उनकी रासलीला में प्रवेश पाएं। महारास में भगवान ने अपने दिए हुए वचन के अनुसार इन ऋषि-मुनियों को आमंत्रित कर सभी को महारास में शामिल कर अपना वचन निभाया।
भजनों पर झूमे भक्तगण और हुआ सम्मान
कथा के दौरान जब महाराज जी ने "मन में मुरारी," "रास रच्यो है यमुना किनारे," और "वृंदावन कुंज भवन नाचत गिरधारी" जैसे आनंद से भरे भजनों का गायन किया, तो भक्तगण झूम-झूम कर नृत्य करने लगे।
महारास महोत्सव के दौरान, राधाकृष्ण मंदिर सेवा समिति की ओर से मुख्य अतिथि नितिन चतुर्वेदी और देवकरण समदानी का स्वागत किया गया। वहीं, सूरज सोनी, श्याम लाल सोनी, रामगोपाल वैष्णव, कैलाश भारद्वाज, पंकज मंडोवरा, सत्यनारायण चेचानी आदि ने भी महाराज जी का स्वागत किया। श्री कल्लाजी वेदपीठ एवं शोध संस्थान के स्वयंसेवी संगठन कल्याण वीर वाहिनी के सदस्यों ने गौनंदन पंडित विकास नागदा का साफा पहनाकर विशेष सम्मान किया।
महारास महोत्सव का समापन देर रात्रि 12 बजे आरती के साथ हुआ, जिसके बाद भक्तों में अमृतमयी औषधीय खीर का वितरण किया गया।