मनासा। मनासा में GBS बीमारी के कारण दो मासूमों की मौत हो चुकी है और 14 से अधिक मरीज संक्रमित हैं। हालात की गंभीरता को देखते हुए प्रदेश सरकार हरकत में आई और स्वास्थ्य शिक्षा उप मुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल, स्टेट हेल्थ कमिश्नर, उज्जैन कमिश्नर सहित सरकारी अमला मनासा पहुँचा। बैठकें हुईं और स्वास्थ्य मंत्री ने मीडिया के सामने दावा किया कि मनासा के सरकारी अस्पताल में सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं, मरीज को बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
लेकिन इस बयान के 24 घंटे भी पूरे नहीं हुए और सरकार के दावे की पोल खुल गई। एक GBS मरीज, जो पहले इंदौर में इलाज कराकर मनासा लौटा था, की तबीयत अचानक बिगड़ गई। परिजन उसे तत्काल मनासा के सरकारी अस्पताल लेकर पहुँचे। डॉक्टरों ने कहा कि सोनोग्राफी करानी पड़ेगी, लेकिन जवाब मिला कि यहाँ सोनोग्राफी की व्यवस्था नहीं है, बाहर रेफर करना पड़ेगा।
यानी बड़े दावे दिल्ली–भोपाल की भाषा में, और हकीकत मनासा के अस्पताल में बुनियादी सुविधाओं की कमी।
सवाल उठे-
जिस आधार पर स्वास्थ्य मंत्री कह रहे हैं कि मरीज को बाहर जाने की जरूरत नहीं?
GBS जैसे गंभीर मरीज की जान जोखिम में डालने की जिम्मेदारी किसकी है?
इस मरीज का नाम कपिल उपाध्याय बताया गया है। यह कोई आंकड़ा नहीं, बल्कि एक ज़िंदगी है, जिसके साथ सिस्टम ने फिर खिलवाड़ किया।
कांग्रेस के ब्लॉक अध्यक्ष श्याम सोनी ने इस मामले में सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं और कहा कि मनासा के अस्पताल की स्थिति बदहाल है।
निष्कर्ष-
बातें बड़ी-बड़ी हैं, लेकिन मनासा का सरकारी अस्पताल आज भी बदहाली में है और जनता को बुनियादी सुविधाओं के लिए बाहर जाना पड़ रहा है।