चित्तौड़गढ़। सुप्रीम कोर्ट द्वारा मातृभाषा आधारित शिक्षा को लेकर दिए गए महत्वपूर्ण निर्णय के बाद राजस्थान में राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग एक बार फिर तेज हो गई है। वर्ष 2010 में चित्तौड़गढ़ से शुरू हुए ‘21वीं सदी के राजस्थान साहित्यिक आंदोलन’ के संस्थापक एवं प्रवर्तक अनिल सक्सेना ‘ललकार’ ने प्रदेश के सभी सांसदों से राजनीतिक मतभेद भुलाकर संसद में एकजुट आवाज उठाने का आह्वान किया है।
अनिल सक्सेना ‘ललकार’ ने कहा कि राजस्थानी केवल एक बोली नहीं, बल्कि राजस्थान की ऐतिहासिक चेतना, लोकसंस्कृति, साहित्य और जनभावनाओं की पहचान है। उन्होंने कहा कि वर्षों से प्रदेशभर में चल रहे राजस्थान साहित्यिक आंदोलन ने लगातार राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने की मांग उठाई है और अब सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद इस मुद्दे को नई मजबूती मिली है।
उन्होंने कहा कि मातृभाषा में शिक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी देश की भाषाई विरासत के सम्मान का संकेत है। ऐसे में केंद्र सरकार को करोड़ों राजस्थानी भाषियों की भावनाओं का सम्मान करते हुए राजस्थानी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करना चाहिए।
अनिल सक्सेना ललकार ने कहा कि पिछले डेढ़ दशक में राजस्थान साहित्यिक आंदोलन के माध्यम से प्रदेश के विभिन्न जिलों में साहित्यिक संवाद, सांस्कृतिक आयोजन, जनजागरण अभियान और साहित्य उत्सव आयोजित किए गए, जिनमें राजस्थानी भाषा का मुद्दा प्रमुख रूप से उठाया जाता रहा है।
उन्होंने कहा कि अब समय केवल आश्वासनों का नहीं, बल्कि निर्णायक पहल का है। यदि राजस्थान के सभी सांसद सामूहिक रूप से संसद में यह मुद्दा उठाएं तो राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने की दिशा में बड़ा परिणाम सामने आ सकता है।