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November 12, 2022, 5:42 pm
NEWS : संत हरेकृष्ण राकेश पुरोहित ने कहा- रामचरणानुरागी भरत से गुरु वशिष्ठ ने भी मानी हार, मीठाराम जी का खेड़ा में भरत चरित्र का दूसरा दिन, पढ़े रेखा खाबिया की खबर 

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चित्तौड़गढ़। मानस मर्मज्ञ कथा व्यास संत हरेकृष्ण राकेश पुरोहित ने कहा कि श्रीराम चरणानुरागी भरत से गुरु वशिष्ठ भी उस समय हार मान गये जब राजा दशरथ के सुरलोक गमन के पश्चात् गुरुदेव वशिष्ठ ने कुमार भरत को अवध का राज सम्भालने का आदेश दिया, लेकिन भरत ने गुरु की आज्ञा को शिरोधार्य करने के बाद भी यह स्पष्ट किया कि वे केवल राम के चरणानुरागी है उन्हें राज करने का कोई अधिकार नहीं है। ऐसी स्थिति में गुरु आज्ञा पाकर भरत राजा राम से मिलने चित्रकूट के लिए निकल पड़े।

 
कथा व्यास पुरोहित शुक्रवार रात्रि को मीठराम जी का खेड़ा में मोहनलाल कमला बाई चेरिटेबल ट्रस्ट की ओर से आयोजित तीन दिवसीय प्रभु प्रेम भरत चरित्र कथा के द्वितीय दिवस व्यासपीठ से प्रवचन कर रहे थे। उन्होंने कहा कि भरत कथा भव बंधन विमोचनी है। संसार में ऐसा कोई जीवन नहीं है जिसे रघुनाथ प्राण प्रिय न हो। उन्होंने आनन्द की व्याख्या करते हुए कहा कि संसार में हर कोई सुख तो चाहता है लेकिन सुख का परिष्कृत रूप आनन्द है और उसी से परमानन्द मिलने पर सच्चिदानन्द के दर्शन संभव है। 

भरत के ननिहाल से आगमन के प्रसंग में पुरोहित ने बताया कि जब उसी समय मंथरा सज धज कर सामने आई तो वह घटनाक्रम विचारणीय था, क्योंकि राजा दशरथ का निधन हो चुका था, ऐसे मौके पर भरत ने माँ को तो पापी कह दिया लेकिन मंथरा पर क्रोध नहीं किया, क्योंकि रघुनाथ की शिक्षा यह थी कि नारी पर हाथ नहीं उठाया जाय। उसी समय भरत ने क्रोधित हुए शत्रुघ्न को भी रोक कर कहा कि कभी विवेक नहीं खोना चाहिये। भरत ने व्याकूल माँ कौशल्या को संभालते हुए चरण पकड़ कर पिता की देह तथा राम, लखन, सीता की जानकारी चाही, लेकिन उस समय राजा दशरथ सुरलोक सिधार गये और राम वन को जा चुके थे। तब भरत ने कहा कि कैकयी यदि बाँझ होती और पुत्र मोह नहीं होता तो आज राम को वनवास नहीं मिलता। 

उसी दौरान भरत का प्रेम सिंधु का प्रथम बिन्दु प्रकट हुआ। उन्होंने स्पष्ट किया कि युवराज राम को वनवास भेजने की उन्हें कोई जानकारी नहीं थी। पुरोहित ने कहा कि भारतीय संस्कृति में षोडश संस्कार का विशेष महत्व है। इसलिए यदि कोई व्यक्ति एक भी संस्कार पूर्ण भाव से कर लें तो उसका भाग्य बदल सकता हैं उन्होंने अयोध्या एवं वृंदावन को धाम निरूपित करते हुए कहा कि इन दो धाम से जीवन में सब कुुछ प्राप्त किया जा सकता है। 

गुरु वशिष्ट के प्रसंग में उन्होंने बताया कि यश, अपयश हरि हाथ है। वहीं जीवन मरण भी प्रभु पर निर्भर है। उन्होंने बताया कि भरत का हित तो सिया-राम में निहित था। ऐसे में अगर वे राजभार संभालेंगे तो धरातल रसातल में पहुँच जाएगा। 
सुरमयी ठण्ड के बीच मध्यरात्रि तक चली कथा के दौरान राज्यमंत्री सुरेन्द्र सिंह जाड़ावत, जिला प्रमुख डॉ. सुरेश धाकड़, सभापति संदीप शर्मा, उपसभापति कैलाश पंवार, पूर्व चेयरमेन रमेशनाथ योगी, प्रेमप्रकाश मूंदड़ा सहित कई पार्षद एवं बड़ी संख्या में श्रोता भक्ति रस में गोते लगाते रहे। कथा के दौरान जब व्यास पीठ से भजनानन्दी स्वरलहरियाँ बिखरने लगी तो कई प्रशासनिक, पुलिस अधिकारी भी स्वयं को नहीं रोक पाए और वे नृत्य करते हुए प्रभु श्रीराम एवं कान्हा की कृपा प्राप्ति का जतन करते देखे गये।

प्रारम्भ में व्यासपीठ का पूजन आयोजक परिवार की ओर से किया गया। कथा में मेवाड़ के अलावा, मारवाड़, वागड़, हाड़ौती एवं अन्य क्षेत्रों से भी श्रद्धालु मौजूद थे। इस दौरान गो प्रेमी पुरोहित के आह्वान पर गजेन्द्र-सुनीता जोशी ने गोशाला के लिए 11 हजार की राशि समर्पित करने के साथ ही अन्य लोगों ने भी श्रद्धानुसार राशि अर्पण की।

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