नीमच। दूसरों को खुशियां प्रदान करें ऐसे भाव प्रत्येक मनुष्य के होना चाहिए। यदि भाव गलत होगा तो फल भी गलत मिलेगा। मदीरा की सेवा से पाप नहीं पुण्य बढ़ता है। ज्ञान व तप का मूल्य तब होता है जब भावना पवित्र होती है। यदि तपस्या में दिखावा हो तो सारी मनोवृतियां सांसारिक हो जाती है ।वह धर्म नहीं होता है उल्टा पाप कर्म बढ़ता है। प्रत्येक कार्य के पीछे मनुष्य को अंतर्मन की पवित्र भावनाओं पर ध्यान देना चाहिए तभी वह जीवन में आत्म कल्याण की ओर अग्रसर हो सकता हे। पवित्र भाव बिना आत्मा का कल्याण नहीं होता है। यह बात आचार्य प्रवर 1008रामलाल जी महाराज साहब के सानिध्य में उपाध्याय प्रवर राजेश मुनि महाराज ने कही।
वे श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ नीमच सिटी के तत्वावधान में नीमच सिटी पुलिस चौकी के समीप जैन मांगलिक भवन में आयोजित धर्म सभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि तपस्या में दिखावा नहीं होना चाहिए। धर्म दिखावे का नहीं आत्मसात का कार्य है। संसार में रहते हुए मनुष्य शरीर के मोह में रहता है। शरीर सुख के लिए गलत तरीके अपनाता है। शरीर की वेदना को कम करने के लिए तपस्या की आराधना की साधना ही उत्तम माध्यम है। दिखावा कर करोड़ों का दान करते हैं तो फलदाई नहीं होता है। यदि मनुष्य जितना ध्यान सांसारिक कार्य में लगाता है यदि उतना ध्यान अपने मन की पवित्र भावना पर लगाए तो उसके जीवन में परिवर्तन हो सकता है। आधुनिक युग में तकनीकी ज्ञान के साथ-साथ मानव स्वभाव जीव दया संवेदनशीलताऔर विनम्रता के आधार पर भी इंटरव्यू में चयन किया जाता है। बहू के लिए कन्या का चयन करते समय ज्ञान शिक्षा सुंदरता के साथ कन्या की परमार्थ सेवा की मनोवृति के माध्यम से भी चयन किया जाता है। कन्या स्वार्थी नहीं होना चाहिए। धर्म क्षेत्र में नैतिक मूल्य के अंतर भावना का महत्व होता है। संतो के ज्ञान से जीवन परिवर्तन होना चाहिए तभी वह ज्ञान सार्थक होता है। संतों का ज्ञान तभी सार्थक होता है जब हमारे मन में जीवन परिवर्तन की भावना होती है। मन की भावना से परिणाम जीरो या 100प्रतिशत हो सकते हैं। भावना पवित्र हो तो जीवन का कल्याण हो सकता है। मरुदेवी माता को दर्शन मात्र से ही केवल ज्ञान हो गया था। कोई भी धर्म कार्य छोटा या बड़ा नहीं होता उसका भाव पवित्र होना चाहिए। मन के भीतर सम का भाव बढ़ना चाहिए। अहंकार का भाव घटना चाहिए। समभाव की वृद्धि होना चाहिए समभाव से ही विकास हो सकता है समभाव के लिए परिश्रम करना चाहिए। छोटी धर्म क्रिया से भी बड़ा परिणाम प्राप्त हो सकता है ।कर्मों की निर्झरा के लिए धर्म कर्म करना चाहिए। छोटी सी भूल के कारण कभी-कभी महाश्रमण की तपस्या भी हमें नरक की ओर ले जा सकती है। रोगी की तुलना में स्वस्थ व्यक्ति अधिक शक्तिशाली होता है। मनुष्य के जीवन में पवित्र भावना ही उसको सही दिशा की ओर आगे बढ़ाती है। इस अवसर पर आचार्य श्री ने सभी उपस्थित समाज जनों को मांगलिक श्रवण कराकर आशीर्वाद प्रदान किया।
इस अवसर पर महिला मंडल ने धन्य है जिनवाणी गुरुवर धन्य है गीत प्रस्तुत किया। राष्ट्रीय संयोजक महेश नाहटा ने कहा कि गुरुदेव के सानिध्य में 377 दीक्षा हो चुकी है। संयम जीवन का पालन करते हुए 16 राज्यों को जिनशासन का मार्गदर्शन प्रदान किया है। गुरुदेव ने पवित्र भाव के साथ साधना की ऊंचाइयों को प्राप्त किया है। इस अवसर पर बड़ी संख्या में समाज जनों ने आयम्बिल तप, उपवास, एकाशना आदि का संकल्प लिया। भाजपा जिला अध्यक्ष पवन पाटीदार ने कहा कि गुरुदेव के मार्गदर्शन में व्यसन मुक्त जीवन का मार्गदर्शन मिल रहा है। नीमच वासी सौभाग्यशाली है। हम गौरवान्वित है कि हमें ऐसे गुरुवर का चातुर्मास मिला है। गुरु वाणी से नीमच की जनता धन्य होगी। युवा पीढ़ी धर्म को अपनाकर अपने जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन करेगी। भाव पवित्र होंगे तो हम धन्य होंगे ।सभी मिलकर समाज सेवा जीव कल्याण के लिए कार्य करेंगे। नगर पालिका अध्यक्ष स्वाति गौरव चोपड़ा ने भी अपने विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर नीमच सिटी श्री संघ के अध्यक्ष उमराव सिंह राठौड़, कोषाध्यक्ष दिलीप कटारिया,नाहर सिंह राठौड, नरेंद्र गांधी, गुणवंत सेठिया, शौकीन मुनेत सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित थे धर्म सभा का संचालन विजय बाफना ने किया।
धर्म प्रभावना का वितरण शिव कोचेटा ,प्रसन्न सुनील बोकाडिया ,रोहित कोचेटा रोहित रचना कोचेटा परिवार की ओर से किया। गया। गुरुदेव की धर्म सभा में किसी को भी मोबाइल लैपटॉप घड़ी कैमरा ले जाने की स्वीकृति नहीं मिलती है।