नीमच। जिले में ताजियेदारी बनाने का कार्य पिछले 200 वर्षों से निरन्तर जारी है। ताजिये बनाने वालों की पांच पीढ़िया गुजर गई है। ताजिये बनाने का यह काम आज तक बदस्तूर जारी है। वैसे तो मोहर्रम गम और मातम का महीना है, जिसे इस्लाम धर्म को मानने वाले लोग मनाते हैं। इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक, मोहर्रम इस्लाम धर्म का पहला महीना होता है। यानी मोहर्रम इस्लाम के नए साल या हिजरी सन का शुरुआत होती है। मोहर्रम बकरीद पर्व के 20 दिनों के बाद मनाया जाता है। इस बार मोहर्रम का महीना 8 जुलाई से शुरू हुआ हैं, जिसे मोहर्रम की 9 और 10 तारीख यानी 16 और 17 जुलाई को आशूरा और मोहर्रम मनाया जाएगा।
गौरतलब हैं कि ईस्लाम धर्म के लोगों के लिए यह महीना बहुत अहम होता है, क्योंकि इसी महीने में हजरत इमाम हुसैन की शहादत हुई थी हजरत इमाम हुसैन इस्लाम धर्म के संस्थापक हजरत मुहम्मद साहब के छोटे नवासे थे, उनकी शहादत की याद में मोहर्रम के महीने के 10 वें दिन को लोग मातम के तौर पर मनाते हैं, जिसे आशूरा भी कहा जाता है। इस्लाम धर्म की मान्यता के मुताबिक, हजरत इमाम हुसैन अपने 72 साथियों के साथ मोहर्रम माह के 10 वें दिन करबला के मैदान में शहीद हो गए थे।
उनकी शहादत और कुर्बानी के तौर पर इस दिन को याद किया जाता है। इंसानियत को बचाने के लिए यजीद के खिलाफ इमाम हुसैन ने करबला की जंग लड़ी और शहीद हो गए। इस दिन लोग इमाम हुसैन की शहादत की याद में ताजिया और जलसा निकालते हैं।