भोपाल। रविन्द्र भवन परिसर स्थित गौरांजनी सभागार में सोमवार को कोरकू भाषा सम्मेलन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का आयोजन साहित्य अकादमी, नई दिल्ली व अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय भोपाल के संयुक्त तत्वावधान एवं संस्कृति मंत्रालय भोपाल के सहयोग से किया गया। सम्मेलन के प्रथम सत्र, द्वितीय सत्र, तृतीय सत्र में देश के विभिन्न प्रांतों से पधारे प्रोफेसर, विद्वानजन, विशेषज्ञ विशेष रूप से उपस्थित रहें तथा सभी सत्रों में कोरकू भाषा से संबद्ध विविध विषयों पर आधारित शोधलेखों का वाचन किया गया।
राव ने अपने वक्तव्य में कहा कि भारत में बड़ी संख्याओं में भाषाओं का समूह है। विभिन्न प्रकार की भाषा में साहित्यिक रचनाओं का विकास हुआ। भावस्कर ने कहा कि कोरकू के इतिहास का आरंभ ओस्ट्रो एसियाटिक (मुंडा) परिवार से आया है। मुंडा परिवार की भाषा में से एक भाषा कोरकू है। यह भाषा धीरे धीरे विलुप्त होने के कगार पर है। मवई, अखाड़ी , बात्य रोटी, आखती आदि रीति रिवाज आज भी कोरकू समाज में जीवित हैं, इनकी संस्कृति को बचाने की आवश्यकता है। प्रो.धमेंद्र पारे ने कहा कि मध्य प्रदेश में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अंतर्गत कक्षा 1 से 3 तक की स्कूली शिक्षा में मातृभाषा को महत्व दिया जा रहा है। जिसके अंतर्गत कोरकू को भी महत्व दिया जा रहा है। यह अच्छी बात है। मेरा मानना है, कि केवल शिक्षा से नहीं, आचरण से मातृभाषा बचती हैं। वर्तमान में कोरकू की जनसंख्या लगभग 10 लाख होंगी। प्राचीन काल में रामायण और महाभारत में भी कोरकू का वर्णन किया गया है।
सम्मेलन का उदघाटन अतिथियों द्वारा दीप प्रज्जवलित कर किया गया। मंच पर मुख्य रूप से साहित्य अकादमी,नई दिल्ली के सचिव के श्रीनिवास राव, प्रख्यात कोरकू लेखक प्रो. सुनील भावस्कर, जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास निदेशक भोपाल प्रो. धर्मेंद्र पारे, लोक निर्माण विभाग पूर्व सचिव, प्रो. पी.सी. बारस्कर, अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय कुलपति, प्रो. खेमसिंह डहेरिया, कुलसचिव शैलेन्द्र कुमार जैन मौजूद रहे। कुलपति डहेरिया ने कहा यह प्रथम कोरकू सम्मेलन है, यह विश्वविद्यालय के लिए खुशी की बात है। अमरकंटक जनजातीय विश्वविद्यालय में जनजातियों की भाषा को बचाने के लिए विविध परियोजनाएं चलाई गई, जो लगभग 5 करोड़ की रहीं, जिसका समापन अभी हुआ है। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में गहन विचार, विमर्श, चिंतन, शोध करने की आवश्यकता है। इस मौके पर विश्वविद्यालयों/ महाविद्यालयों के सभी प्राध्यापकों, सह प्राध्यापकों, सहायक प्राध्यापकों, अतिथि विद्वानों, लेखकों , विशेषज्ञों ने बड़ी संख्या में अपनी सक्रिय सहभागिता देकर कोरकू भाषा सम्मेलन को सफल बनाया तथा इस वैचारिक उपक्रम से लाभान्वित भी हुए।