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September 20, 2024, 5:46 pm
KHABAR : संदेशो की संजा संध्या कार्यक्रम का आयोजन, संजा सीधे-सीधे हमें पर्यावरण व अपने परिवेश से जोड़ती है - स्वप्निल व्यास, पढे़ खबर 

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इंदौर। संजा शब्द संध्या का ही एक लोक रूप है कुंवारी कन्याएं इसे मंगलदायी देवी के रूप में मन के अनुकूल वर की प्राप्ति की इच्छा से मनाती हैं। मालवा-निमाड़ की लोक-परंपरा श्राद्ध पक्ष के दिनों में कुंआरी लड़कियां मां पार्वती से मनोवांछित वर की प्राप्ति के लिए पूजन-अर्चन करती हैं। संजा मनाने की यादें लड़कियों के विवाहोपरांत गांव-देहातों की यादों में हमेशा के लिए तरोताजा बनी रहती हैं और यही यादें उनके व्यवहार में प्रेम,एकता और सामंजस्य का सृजन करती हैं। संजा सीधे-सीधे हमें पर्यावरण व अपने परिवेश से जोड़ती है और यही भाव से मालवमंथन हर वर्ष संदेशों की संजा का आयोजन करता है। जिसका उद्देश्य मालवा की लोक संस्कृति, मालवी लोक गीतों एवं उनमें छिपे पर्यावरण संरक्षण के मौलिक भाव को आज के आधुनिक समाज मे जीवित रखना है। साथ ही यह वर्ष हम मालवा वासियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह वर्ष पुण्यश्लोक लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर की त्रिशताब्दी जयंती वर्ष है। जिस तरह संजा पर्व कन्याओं को भावी जीवन जीने का सलीका सिखाता है तो वहीं मां अहिल्या का जीवन उन्हें नारी से देवी बनने की प्रेरणा देता है उक्त उद्गार पर्यावरणविद् एवं कार्यक्रम के संयोजक स्वप्निल व्यास ने मालवमंथन द्वारा संदेशो की संजा संध्या कार्यक्रम ग्राम बुढ़ानिया, इंदौर में व्यक्त किए।


कार्यक्रम की आयोजक बीना राजवंशी ने बताया यहां बालिकाओं एवं गांव की महिलाओं ने परंपरागत संजा उकेरी एवं पूजा-आरती के साथ संजा के परंपरागत मालवी गीत संजा तू थारा घर जा,थारी माय मारेगी कि कुटेगी,चांद गयो गुजरात..संजा माता जीम ले३ छोटी-सी गाड़ी लुढ़कती जाए, जी में बैठी संजा बाई आदि गए एवं गोबर से आने वाले सोलह दिनों में बनने वाली पूनम के पाटला, दूसरे दिन बिजौर, तीसरे दिन घेवर, चौथे दिन चौपड़ और पंचमी को पांच कुंवारे, छठे दिन छबड़ी,सातवें दिन स्वस्तिक या सप्तऋषि आठवें दिन अठफूल नौवें दिन डोकरा-डोकरी और दसवें दिन वंदनवार, ग्यारहवें दिन केले का पेड़, बारहवें दिन जलेबी की जोड़, तेरहवें दिन किलाकोट, जिसमें 12 दिन बनाई गई आकृतियों का समावेश होता है। वह आज मुख्य रूप से बनाई साथ ही माता अहिल्या को समर्पित संजा भी बनाई गई।


वही संजा से जुड़ी सामाजिक,पारंपरिक एवं व्यावहारिक विशेषताएं बालिकाओं को स्मृति आदित्य ने बताई। संजा बनाने वाली प्रतिभागियों में नंदिनी राठौर अक्षरा पंवार हिना पंवार महिमा सोनानी, जया पंवार, दिव्या जाटव ,पावनी कुशवाहा इशिका जाटव, दिव्यांशी चौधरी, पलक जातिवाच, वंशिका चौधरी एवं प्रज्ञा चौधरी एवं सुनीता थी। कार्यक्रम में आदित्य पांडे, रमेश चौधरी दिलीप सिसौदिया, जगदीश पटेल, धर्मेंद्र चौधरी, कृष्णा बाई, सजन बाई, ज्योति चौधरी, सौरव राजवंशी उपस्थित रहे।

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