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February 27, 2025, 3:57 pm
KHABAR : शिवराज बोले-वोट दिलाऊ फैसले करने पड़ते हैं, चुनाव के डर में वोट बचाने के लिए कई निर्णय नहीं हो पाते, एक साथ इलेक्शन जरूरी, पढे़ खबर 

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भोपाल। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि बार-बार चुनावों के कारण कई फैसले प्रभावित होते हैं। गवर्नेंस प्रभावित होती है, विकास रुक जाता है पैसे की बर्बादी होती है। कई बार तो वोट दिलाऊ फैसले भी करने पड़ते हैं। शिवराज ने भोपाल के एक प्राइवेट कॉलेज में आयोजित श्एक देश-एक चुनावश् कार्यक्रम में स्टूडेंट्स के साथ संवाद किया। इस दौरान उन्होंने कहा- अपने देश में और कुछ हो या न हो लेकिन सारे राजनीतिक दल पांचों साल, 12 महीने, हर हफ्ते, 24 घंटे एक ही तैयारी करते हैं, वो है अगला चुनाव। उसी तैयारी में लगे रहते हैं। शिवराज ने कहा कि अब पिछले साल नवंबर-दिसंबर में एमपी, छत्तीसगढ़, राजस्थान विधानसभा चुनाव हुए। विधानसभा चुनाव की थकान उतरी नहीं थी कि 4 महीने बाद ही लोकसभा चुनाव आ गया। विधानसभा चुनाव में 6 महीने तो कुछ हुआ ही नहीं था। आचार संहिता, कोड ऑफ कंडक्ट के कारण विकास के काम ठप थे। वो चुनाव हुए और चार महीने बाद फिर लोकसभा के चुनाव आ गए। चार-छह महीने नहीं गुजरे कि फिर हरियाणा, जम्मू कश्मीर, झारखंड, महाराष्ट्र के चुनाव आ गए और नेता फिर चुनाव में भिड़ गए।शिवराज ने कहा, अभी एक चुनाव निपटा नहीं कि दिल्ली का दंगल शुरू हो गया। दिल्ली के चुनाव खत्म नहीं हुए कि हम लोगों ने बिहार के लिए कमर कस ली। चलो बिहार। और कोई काम हो न हो, चौबीसों घंटे चुनाव की तैयारी। ये हमेशा होने वाले चुनाव देश की प्रगति और विकास में कितने बाधक हैं। एक तो सभी की एनर्जी लगती है, जिसमें प्रधानमंत्री भी चुनाव की तैयारी में लगते हैं।शिवराज ने कहा, चुनाव में पीएम, सीएम सब लगे रहे। केन्द्रीय मंत्री मुझे बनाया गया और कहा गया झारखंड के चुनाव में जाओ । तीन महीने वहीं पड़ा रहा। कृषि की तरफ ध्यान ही नहीं रहा। फोकस चुनाव पर हो गया। मेरे जैसे कितने लोग लगे रहे। ये केवल एक पार्टी में नहीं सभी पार्टियों के मंत्री, मुख्यमंत्री, विधायक सांसद लगे रहते हैं। शिवराज ने कहा- अलग-अलग चुनाव क्यों होने चाहिए? हर चार-छह महीने में चुनाव हो रहे हैं। गवर्नेंस प्रभावित होता है। धन का अपव्यय होता है। असल में तो औपचारिक खर्चा दिखता है, पीछे से और कितना खर्चा होता है। चुनाव आयोग ने इस चुनाव में गाड़ियों से पैसे पकड़े थे। एक तरफ धन का अपव्यय होता है, दूसरी तरफ सरकारें लॉन्ग टर्म प्लानिंग नहीं कर पातीं।


 

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