नीमच। खेतों में खिले सफेद फूलों के बीच अफीम किसानों की आंखें आज आसमान से जूझ रही हैं। “काला सोना” कहे जाने वाली फसल जब उम्मीदों की डोर थामे खड़ी है, तभी बारिश और ओलावृष्टि के अलर्ट ने किसानों की रातों की नींद उड़ा दी है। एक झोंका हवा का, एक पल की बरसात और सालभर की मेहनत मिट्टी में मिल जाने का डर अफीम के हर खेत में पसरा हुआ है। मौसम विभाग ने नीमच-मंदसौर के साथ एमपी के कई जिलों में बारिश का अलर्ट जारी किया है।

मालवा-मेवाड़ की पहचान मानी जाती है अफीम की फसल-
आपकों बता दें कि मालवा-मेवाड़ की पहचान मानी जाने वाली अफीम की फसल इन दिनों अपने पूरे शबाब पर है। खेतों में लहलहाती हरियाली के बीच सफेद फूलों की चादर बिछी हुई है और अब धीरे-धीरे डोडों का बनना भी शुरू हो गया है। यह दौर आमतौर पर किसानों के लिए उम्मीद और खुशहाली का संकेत होता है, लेकिन मौसम विभाग के अलर्ट ने किसानों की चिंता को बढ़ा दिया है।

नाजुक अवस्था में भारी नुकसान की आशंका
किसानों के अनुसार “काले सोने” के नाम से पहचानी जाने वाली अफीम की फसल इस समय बेहद नाजुक अवस्था में है। थोड़ी सी भी तेज बारिश, आंधी या ओलावृष्टि से डोडों को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है। यही कारण है कि नीमच सहित पूरे मालवा-मेवाड़ क्षेत्र के अफीम किसान दिन-रात खेतों की रखवाली में जुटे हुए हैं और आसमान की ओर टकटकी लगाए हुए हैं।

पशु-पक्षियों और जंगली जानवरों से भी जंग-
मौसम के साथ-साथ पशु-पक्षियों और जंगली जानवरों से फसल बचाना भी किसानों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। कहीं खेतों के चारों ओर कंटीली तारबंदी की गई है तो कहीं किसान रात-रात भर खेतों में पहरा दे रहे हैं। किसानों का कहना है कि वर्तमान में फसल पर फूल और डोडे आ चुके हैं। यदि इस दौरान तेज बारिश हुई तो फसल आड़ी पड़ सकती है और ओलावृष्टि की स्थिति में डोडों के टूटने का खतरा रहता है, जिससे भारी आर्थिक नुकसान हो सकता है।

कई जिलों में बारिश-आंधी का अलर्ट-
मौसम विभाग के अनुसार एक नए मौसमीय सिस्टम के सक्रिय होने से प्रदेश के लगभग 15 जिलों में आंधी, बारिश और गरज-चमक के साथ आकाशीय बिजली गिरने की संभावना जताई गई है। प्रभावित जिलों में ग्वालियर, श्योपुर, मुरैना, भिंड, दतिया, शिवपुरी, गुना, अशोकनगर, राजगढ़, आगर-मालवा, नीमच, मंदसौर, निवाड़ी, टीकमगढ़ और छतरपुर शामिल हैं। 18 फरवरी को इसका सबसे अधिक असर देखने को मिल सकता है, जबकि 19 फरवरी को हल्की बूंदाबांदी के आसार हैं।

फरवरी में तीसरी बार भीगेगा प्रदेश-
उल्लेखनीय है कि फरवरी माह की शुरुआत में ही प्रदेश में दो बार बारिश, ओले और आंधी का दौर आ चुका है, जिससे कई फसलों को नुकसान हुआ था। इसके बाद सरकार द्वारा प्रभावित फसलों का सर्वे भी कराया गया। अब 18 फरवरी से तीसरी बार प्रदेश के भीगने की संभावना है, हालांकि इसके बाद सिस्टम के कमजोर पड़ने की बात कही जा रही है।

फरवरी-मार्च में सबसे संवेदनशील होती है अफीम की खेती-
फरवरी के मध्य व मार्च माह के अंत तक अफीम के डोडों पर चीरा लगाया जाता है और उनसे निकलने वाला रस जमता है, तब फसल अपने सबसे संवेदनशील चरण में होती है। इस दौरान मौसम की मार, चोरी या थोड़ी-सी लापरवाही भी पूरे साल की मेहनत पर पानी फेर सकती है। खास बात यह है कि यदि अफीम चोरी की घटना होती है, तो संबंधित किसान को अगली बार अफीम की बुवाई का लाइसेंस तक नहीं दिया जाता।

अनुशासन और निगरानी में पलती है अफीम-
अफीम की खेती केवल खेतों में ही नहीं, बल्कि कड़े अनुशासन, सतत निगरानी और जिम्मेदारी के साए में पनपती है। किसान इसे सिर्फ कमाई का साधन नहीं, बल्कि बड़ी जिम्मेदारी मानकर संभालते हैं। ऐसे में मौसम की अनिश्चितता और बारिश-ओलावृष्टि का खतरा उनकी मेहनत की सबसे बड़ी परीक्षा बनकर सामने खड़ा है।
