भोपाल। राजधानी भोपाल में आवासीय भवनों के व्यावसायिक उपयोग और अवैध निर्माण के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सुनवाई करते हुए मध्य प्रदेश सरकार को बड़ा झटका दिया। कोर्ट में राज्य सरकार द्वारा गठित 10 सदस्यीय जांच समिति की कार्रवाई पर रोक लगाने के बारे में दलीलें दी गईं। मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर को होगी।
साथ ही इस मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट से दुकान संचालकों को मिले सभी राहत आदेश (स्टे ऑर्डर) निरस्त कर दिए। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि उसके निर्देश पर चल रही जांच में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जाएगा।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने मध्य प्रदेश शासन की ओर से पेश अधिवक्ता को भी कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि सर्वाेच्च न्यायालय के आदेशों के समानांतर किसी अन्य प्रक्रिया या जांच समिति के माध्यम से कार्रवाई प्रभावित नहीं की जा सकती।
नगर निगम बोला- कार्रवाई करना चाहते हैं, लेकिन हाथ बंधे हैं
सुनवाई के दौरान नगर निगम की ओर से अदालत को बताया गया कि निगम अवैध निर्माण और व्यावसायिक उपयोग के खिलाफ कार्रवाई करना चाहता है, लेकिन विभिन्न स्तरों पर बाधाओं के कारण प्रभावी कार्रवाई नहीं हो पा रही है।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून के पालन में किसी प्रकार की ढिलाई स्वीकार नहीं की जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद फिर तेज होगी कार्रवाई
सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद माना जा रहा है कि राजधानी में आवासीय भूखंडों पर संचालित व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के खिलाफ नगर निगम की कार्रवाई फिर तेज होगी। कोर्ट ने साफ संकेत दिए कि अवैध निर्माण और भूमि उपयोग के उल्लंघन के मामलों में निर्धारित प्रक्रिया के तहत कार्रवाई जारी रखी जाए।
मास्टर प्लान लागू करने की मांग को लेकर विधायक का धरना
भोपाल के मास्टर प्लान को लागू करने की मांग को लेकर मध्य से कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने समर्थकों के साथ धरना दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी शहर के सुव्यवस्थित विकास के लिए उसके मास्टर प्लान की जरूर है। मध्य प्रदेश सरकार जल्द से जल्द मास्टर प्लान लागू करें। ताकि, हर वर्ग को राहत मिल सके।
सरकार ने बनाई थी समीक्षा समिति
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद भोपाल नगर निगम ने कई अवैध व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को नोटिस जारी कर सीलिंग की कार्रवाई शुरू की थी। इसके विरोध के बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में हुई बैठक में पूरे मामले की समीक्षा के लिए वरिष्ठ अधिकारियों की 10 सदस्यीय समिति गठित करने का निर्णय लिया गया था।
समिति को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का अध्ययन कर रिपोर्ट देने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। समिति की रिपोर्ट आने तक व्यापारियों को राहत देने की बात भी कही गई थी।