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April 20, 2026, 11:49 am
KHABAR : आस्था का अद्भुत संगम, नीमच में 14 माह की साधना के बाद 95 तपस्वियों ने पूर्ण किया वर्षीतप, भव्य पारणा महोत्सव आयोजित, वर्षीतप पूर्णता पर निकला भव्य वरघोड़ा, पढ़े खबर 

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नीमच। जैन धर्म की महान तप परंपरा का अनुपम उदाहरण ‘वर्षीतप’ इस वर्ष नीमच श्रीसंघ में अद्भुत आस्था और उत्साह के साथ संपन्न हुआ। इस अवसर पर 95 तपस्वियों ने 14 माह की कठोर साधना पूर्ण कर समाज को संयम और आत्मशुद्धि का प्रेरणादायक संदेश दिया।

जैन मान्यता के अनुसार वर्तमान अवसर्पिणी काल के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ की तपस्या से प्रेरित यह व्रत संयम, धैर्य और आत्मशुद्धि का सर्वाेच्च प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान आदिनाथ को बारह घड़ी के अंतराय के कारण 14 माह तक आहार ग्रहण नहीं हुआ था, जिसे कर्म निर्जरा की चरम साधना माना जाता है। इसी परंपरा के अनुकरण में वर्षीतप किया जाता है, जिसमें एक दिन उपवास और एक दिन ब्यासना का क्रम निरंतर 14 माह तक चलता है।

इस ऐतिहासिक तप पूर्णता के उपलक्ष्य में नीमच में भव्य आयोजन किया गया। जैन भवन से प्रारंभ हुआ विशाल वरघोड़ा शहर के प्रमुख मार्गों- महेश सर्कल, कमल चौक, फव्वारा चौक, बारादरी, नया बाजार, घंटाघर और पुस्तक बाजार से होता हुआ मिडिल स्कूल ग्राउंड पहुंचा, जहां यह विराट धर्मसभा में परिवर्तित हो गया। पूरे शहर में “आदिनाथ प्रभु की जय” के जयघोष गूंजते रहे।

वरघोड़े की भव्यता देखते ही बनती थी। 50 से अधिक सुसज्जित बग्गियां, बैंड-बाजे, ढोल-नगाड़ों की गूंज और हाथियों की गरिमामयी उपस्थिति ने आयोजन को ऐतिहासिक स्वरूप प्रदान किया।

धर्मसभा के पश्चात पारणा महोत्सव आयोजित हुआ, जिसमें तपस्वियों ने गन्ने के रस से पारणा कर अपनी कठिन साधना का समापन किया। इस अवसर पर देशभर से तपस्वियों के परिजन और श्रद्धालु बड़ी संख्या में उपस्थित रहे, जिससे आयोजन राष्ट्रीय स्वरूप लेता नजर आया।

उल्लेखनीय है कि चार साधु-साध्वी भगवंतों की वर्षीतप साधना अभी भी सतत जारी है, जो समाज को संयम, त्याग और आत्मकल्याण का संदेश दे रही है।

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