चित्तौड़गढ़। अहिंसा नगर स्थित समीर गुरु विद्यालय में सोमवार को आयोजित कार्यक्रम में श्रमण संघीय युवाचार्य प्रवर महेन्द्र ऋषिजी ने विद्यार्थियों को शिक्षा के साथ संस्कारों का महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने कहा कि विद्यालय केवल अध्ययन का केंद्र नहीं, बल्कि एक ज्ञान मंदिर है, जहां पुस्तकों से जुड़ाव ही सच्ची साधना का आधार बनता है।
युवाचार्यश्री ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि जिस प्रकार हम मंदिर में श्रद्धा और भक्ति के साथ पूजा-अर्चना करते हैं, उसी भाव से विद्यालय में अध्ययन करना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि किताबें केवल परीक्षा में सफलता का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाली अमूल्य धरोहर हैं। इसलिए विद्यार्थियों को पुस्तकों से प्रेम करते हुए निरंतर अध्ययन और लेखन की आदत विकसित करनी चाहिए।
उन्होंने आधुनिक युग में मोबाइल के बढ़ते उपयोग पर संयम रखने की प्रेरणा देते हुए कहा कि तकनीक का उपयोग सीमित और उद्देश्यपूर्ण होना चाहिए। साथ ही उन्होंने हस्तलिखित अभ्यास के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि जितना अधिक हम अपने हाथों से लिखते हैं, उतना ही मस्तिष्क सक्रिय होता है और नई ऊर्जा का संचार होता है। उन्होंने विद्यार्थियों को नियमित लेखन के माध्यम से अपनी एकाग्रता और स्मरण शक्ति को सुदृढ़ करने का संदेश दिया।
इस अवसर पर मेवाड़ उपप्रवर्तक कोमल मुनिजी ने भी विद्यार्थियों को आशीर्वचन देते हुए कहा कि परिश्रम, अनुशासन और सकारात्मक सोच के साथ किया गया अध्ययन निश्चित ही सफलता की ओर ले जाता है।
कार्यक्रम में अहिंसा प्रचारक जैन संघ से जुड़े पवन पटवारी, अखिल भारतीय जैन दिवाकर विचार मंच के प्रकाश नाहर, जैन दिवाकर संगठन समिति के पूर्व अध्यक्ष सुनील बोहरा, मीरानगर सामायिक भवन के अध्यक्ष लक्ष्मीलाल लोढ़ा, जैन कॉन्फ्रेंस के सूर्यप्रकाश सिरोया सहित अनेक श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।
समीर गुरु विद्यालय के प्रबंधक प्रकाश वीरवाल ने युवाचार्यश्री, उपप्रवर्तक कोमल मुनिजी, हितमित भाषी हितेंद्र ऋषिजी एवं उपप्रवर्तिनी दिव्य ज्योति महासती सुचेता सहित संत-साध्वियों का विद्यालय परिवार की ओर से गरिमामय स्वागत एवं अभिनंदन किया।