उज्जैन। शिप्रा तट पर रविवार को उदासीनाचार्य जगद्गुरु श्रीचंद्र भगवान का 532वां प्राकट्य दिवस श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मनाया गया। मुख्य आयोजन श्री पंचायती अखाड़ा बड़ा उदासीन (निर्वाण) में हुआ। पूज्यपाद अद्वैत श्री सतू पंच परमेश्वर के सानिध्य में सुबह से धार्मिक अनुष्ठान शुरू हुए, जिसमें साधु-संतों और श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया।
हवन, पादुका पूजन और अभिषेक हुआ
सुबह 8 बजे से वैदिक मंत्रोच्चार के साथ हवन, पादुका पूजन और भगवान श्रीचंद्र का अभिषेक-पूजन कराया गया। साधु-संतों और श्रद्धालुओं ने अनुष्ठानों में शामिल होकर भगवान श्रीचंद्र का आशीर्वाद लिया।
अखाड़े के श्री सत्यानंद जी महाराज ने बताया कि पूजन के बाद दोपहर 12 बजे से संतों, महंतों और साधु समाज के लिए भंडारे का आयोजन किया गया। इसके बाद भक्तों और आमंत्रित अतिथियों के लिए महाप्रसादी की व्यवस्था की गई। इसमें कई स्थानीय जनप्रतिनिधि भी शामिल हुए।
गुरु नानकदेव और माता सुलक्षणा के पुत्र माने जाते हैं
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उदासीनाचार्य जगद्गुरु श्रीचंद्र भगवान का जन्म भाद्रपद शुक्ल नवमी, विक्रम संवत 1551 (1494 ईस्वी) में हुआ था। उन्हें सिख धर्म के प्रथम गुरु गुरु नानकदेव और माता सुलक्षणा का पुत्र माना जाता है। उन्होंने कम उम्र में ही वेदों और शास्त्रों का अध्ययन कर ज्ञान प्राप्त किया था।
भक्ति, ज्ञान और कर्म के समन्वय का संदेश
श्रीचंद्र भगवान ने पंचदेव उपासना के साथ भक्ति, ज्ञान और कर्म के समन्वय का संदेश दिया। उन्होंने अलग-अलग धार्मिक परंपराओं के बीच सामंजस्य, सौहार्द और सांस्कृतिक एकता के लिए भी काम किया। उदासीन संप्रदाय में उनके दर्शन, जीवन और शिक्षाओं का विशेष महत्व माना जाता है।