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October 6, 2026, 11:21 am
BIG NEWS : मानसून ने दिया बड़ा झटका, मध्य प्रदेश के 11 जिलों में सूखे का खतरा, फसलों से लेकर पेयजल तक संकट, इंदौर-उज्जैन समेत ये 9 जिले सूखे के पैमाने पर, अब सरकार की नजर सर्वे रिपोर्ट पर, पढ़े खबर 

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भोपाल। कमजोर मानसून के कारण मध्य प्रदेश के 11 जिलों में सूखे जैसे हालात बन रहे हैं। इनमें इंदौर और उज्जैन भी शामिल हैं। आलीराजपुर, धार और झाबुआ प्रदेश के उन जिलों में शामिल हैं, जहां सबसे कम बारिश रिकॉर्ड की गई है। आलीराजपुर में सामान्य से 52 प्रतिशत कम बारिश हुई है। कम बारिश का असर आगामी दिनों में पेयजल उपलब्धता के साथ खरीफ फसलों के उत्पादन पर भी पड़ सकता है।

मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार 11 में से 9 जिले ऐसे हैं, जो सामान्य से 26 प्रतिशत या उससे अधिक कम बारिश के आधार पर सूखे के पैमाने पर आ रहे हैं। इनमें इंदौर, उज्जैन, बैतूल, हरदा, नर्मदापुरम, रतलाम, झाबुआ, धार और आलीराजपुर शामिल हैं। शाजापुर और पांढुर्णा में सामान्य बारिश के मुकाबले करीब 3 प्रतिशत का ही अंतर है।

पांढुर्णा में किसानों ने सीएम को दिखाई सूखी फसलें-
पांढुर्णा में किसानों ने 4 अक्टूबर को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के दौरे के दौरान अपनी सूखी और मुरझाई फसलें दिखाकर जिले को तत्काल सूखाग्रस्त घोषित करने तथा कृषि कर्ज माफ करने की मांग की थी। किसानों द्वारा मुख्यमंत्री का काफिला रोके जाने के बाद मुख्यमंत्री गाड़ी से नीचे उतरे और किसानों की समस्याएं सुनीं।

अन्य जिलों में भी कम बारिश के कारण ऐसे ही हालात सामने आ रहे हैं। सोयाबीन, मूंग, मक्का सहित अन्य खरीफ फसलों पर बारिश की कमी का असर पड़ा है। वहीं आगामी रबी सीजन में सिंचाई और पेयजल को लेकर भी परेशानी बढ़ने की आशंका है।

मालवा-निमाड़ के साथ नर्मदापुरम संभाग में भी असर-
मौसम विशेषज्ञ शैलेंद्र कुमार नायक के अनुसार सामान्य से 26 प्रतिशत या उससे अधिक कम बारिश होने पर जिले को सूखे के संभावित दायरे में माना जाता है। इस बार मालवा-निमाड़ के साथ नर्मदापुरम संभाग के कई जिलों में भी बारिश की कमी दर्ज की गई है।

उन्होंने कहा कि जिन क्षेत्रों में बारिश कम हुई है, वहां सरकार को अभी से माइक्रो लेवल पर तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। पेयजल और सिंचाई के इंतजाम, पानी के उपयोग पर आवश्यक प्रतिबंध और जलस्रोतों की स्थिति की निगरानी अभी से जरूरी है। गर्मी बढ़ने के साथ जल संकट और गंभीर हो सकता है, इसलिए उपाय पहले से किए जाने चाहिए।

10 साल में तीसरी बार ऐसे हालात-
मध्य प्रदेश में 2015 के बाद 2026 में एक बार फिर कई क्षेत्रों में सूखे जैसे हालात बन रहे हैं। वर्ष 2017 में प्रदेश में 29.9 इंच, 2018 में 34.3 इंच बारिश हुई थी। इसके मुकाबले 2019 में 53 इंच, 2022 में 46 इंच और 2025 में 45.2 इंच बारिश दर्ज की गई थी। इस बार बारिश का वितरण भी असमान रहा और प्रदेश में सामान्य से करीब 4 प्रतिशत कम बारिश रिकॉर्ड की गई।

गिरदावरी रिपोर्ट के बाद साफ होगी स्थिति-
विशेषज्ञों के अनुसार कम बारिश वाले जिलों में फसल की स्थिति का आकलन गिरदावरी रिपोर्ट के माध्यम से किया जाएगा। कलेक्टरों के जरिए फसल खराबी और अभावग्रस्त क्षेत्रों की रिपोर्ट राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग तक भेजी जाएगी। हालांकि सर्वे की प्रक्रिया अभी शुरू नहीं हुई है, लेकिन सिंचाई और पेयजल की स्थिति को देखते हुए जल्द ही मैदानी स्तर पर सर्वे कराया जा सकता है।

इसके बाद शासन स्तर पर सूखा प्रभावित जिलों की स्थिति स्पष्ट होगी। फिलहाल मौसम विभाग के आंकड़े बताते हैं कि 11 जिलों में बारिश की कमी सबसे अधिक है।

पिछले साल 51 जिलों में हुई थी अधिक बारिश-
वर्ष 2025 में प्रदेश में मानसून काफी सक्रिय रहा था। उस दौरान 51 जिलों में सामान्य से अधिक बारिश दर्ज की गई थी। गुना प्रदेश में सर्वाधिक बारिश वाले जिलों में रहा, जहां पूरे मानसून सीजन में 65.7 इंच पानी दर्ज हुआ। श्योपुर में सामान्य के मुकाबले 216.3 प्रतिशत अधिक बारिश हुई थी।

वहीं शाजापुर में सबसे कम 28.9 इंच यानी सामान्य के मुकाबले 81.1 प्रतिशत बारिश दर्ज की गई थी। इस साल स्थिति इसके विपरीत नजर आ रही है। इस बार प्रदेश के 25 जिलों में ही सामान्य से अधिक बारिश हुई है, जबकि करीब 30 जिलों में बारिश का आंकड़ा सामान्य से कम रहा है।

मौसम विभाग का पूर्वानुमान रहा सटीक-
मौसम विभाग ने इस मानसून सीजन में प्रदेश में सामान्य से कम बारिश होने का अनुमान जताया था। विभाग ने प्रदेश में सामान्य बारिश की तुलना में करीब 90 से 95 प्रतिशत बारिश होने की संभावना बताई थी। मौजूदा आंकड़ों में भी बारिश सामान्य से कम रहने के संकेत मिले हैं।

सिर्फ कम बारिश से घोषित नहीं होता सूखा-
किसी जिले में सामान्य से कम बारिश होना ही उसे सूखाग्रस्त घोषित करने का आधार नहीं है। इसके लिए बारिश की कमी के साथ बोवनी का क्षेत्रफल, फसलों की स्थिति, मिट्टी में नमी, भूजल स्तर और जलाशयों में पानी की उपलब्धता सहित कई संकेतकों का आकलन किया जाता है।

इसके बाद प्रभावित क्षेत्रों का मैदानी सर्वे और ग्राउंड वेरिफिकेशन कराया जाता है। जिला प्रशासन इन आंकड़ों के आधार पर रिपोर्ट तैयार कर शासन को भेजता है। शासन स्तर पर रिपोर्ट और विभिन्न संकेतकों का परीक्षण करने के बाद सूखा घोषित करने का निर्णय लिया जाता है। निर्णय होने पर प्रभावित जिले, तहसील या अन्य क्षेत्र के संबंध में अधिसूचना जारी की जाती है। खरीफ सूखे की घोषणा 31 अक्टूबर तक किए जाने का प्रावधान है।

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