नई दिल्ली/चित्तौड़गढ़। चित्तौड़गढ़ सांसद सीपी जोशी ने न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के पूर्ण सत्र में भारत का वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए महासभा की केंद्रीय भूमिका बनाए रखने, कार्यप्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने और संस्थागत जवाबदेही मजबूत करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र को वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप अधिक प्रतिनिधिक, पारदर्शी और परिणामोन्मुख बनाने के लिए व्यापक सुधार आवश्यक हैं।
सांसद जोशी ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र महासभा संगठन का सार्वभौमिक प्रतिनिधि अंग है। ऐसे में इसकी केंद्रीय भूमिका को बनाए रखना और कार्यप्रणाली को अधिक सुव्यवस्थित बनाना जरूरी है। उन्होंने एजेंडे को अधिक प्रबंधनीय बनाने, महासभा की मुख्य समितियों और पूर्ण सत्र के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने तथा अध्यक्ष कार्यालय में संस्थागत स्मृति और जवाबदेही को मजबूत करने की आवश्यकता रेखांकित की।
यूएन80 पहल और संकल्प 79/327 का किया स्वागत-
सीपी जोशी ने महासभा द्वारा संकल्प 79/327 अपनाए जाने से प्राप्त प्रगति का स्वागत किया। उन्होंने यूएन80 पहल को संयुक्त राष्ट्र की कार्यप्रणाली को अधिक कुशल, प्रभावी और उत्तरदायी बनाने की दिशा में उपयोगी प्रयास बताया। उन्होंने कहा कि संस्थागत प्रक्रियाओं में सुधार के साथ उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करना भी जरूरी है।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि महासभा के पुनर्जीवन की प्रक्रिया केवल प्रक्रियागत बदलावों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसे संयुक्त राष्ट्र के व्यापक संस्थागत सुधारों के साथ आगे बढ़ाया जाना चाहिए। इसके लिए विभिन्न अंगों के बीच बेहतर तालमेल और पारदर्शी कार्यप्रणाली आवश्यक है।
सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधार की आवश्यकता-
सांसद जोशी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की संरचना में सुधार का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र की संस्थागत व्यवस्था में आज की वैश्विक वास्तविकताओं और बदलती अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का प्रतिबिंब होना चाहिए। इसके लिए सुरक्षा परिषद में स्थायी और निर्वाचित, दोनों श्रेणियों में सदस्यता का विस्तार आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि महासभा की कार्यप्रणाली, संस्थागत जवाबदेही और सुरक्षा परिषद में सुधार जैसे प्रयासों को समन्वित रूप से आगे बढ़ाने से संयुक्त राष्ट्र को अधिक प्रतिनिधिक और प्रभावी बनाने में मदद मिलेगी।
सीपी जोशी के वक्तव्य में महासभा की केंद्रीय भूमिका बनाए रखने, कार्यप्रणाली को सुव्यवस्थित करने और व्यापक संयुक्त राष्ट्र सुधारों को गति देने पर विशेष बल दिया गया।