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November 4, 2026, 10:38 am
BIG NEWS : गांधीसागर में चीतों के लिए तैयार हो रहा प्राकृतिक भोजन का मजबूत आधार, उज्जैन से लाए गए काले हिरण और नीलगाय, बोमा में 24 घंटे वन विभाग की पहरेदारी, पढ़े अजय सिंह सिसौदिया के साथ शेख ईसाक की खबर

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मंदसौर। मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले में स्थित गांधीसागर वन्यजीव अभयारण्य चीता परियोजना के साथ वन्यजीव संरक्षण के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में अपनी पहचान बना रहा है। चीतों के अनुकूल प्राकृतिक वातावरण विकसित करने के साथ ही अभयारण्य में अन्य वन्यप्राणियों की सुरक्षित मौजूदगी और उनकी संख्या बढ़ाने के लिए भी वन विभाग द्वारा लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। इन प्रयासों से गांधीसागर अभयारण्य का वन्यजीव कुनबा लगातार समृद्ध होता दिखाई दे रहा है।

इस संबंध में मंदसौर वनमंडलाधिकारी (DFO) संजय रायखेरे ने चर्चा के दौरान गांधीसागर अभयारण्य में संचालित चीता परियोजना, वन्यजीवों की मौजूदगी और उनके संरक्षण के लिए किए जा रहे प्रयासों की महत्वपूर्ण जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि अभयारण्य का महत्व केवल चीता परियोजना तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां के संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र, प्राकृतिक आवास और जैव विविधता का संरक्षण भी वन विभाग की प्राथमिकताओं में शामिल है।

चीतों के लिए भोजन और सुरक्षित प्राकृतिक आवास पर विशेष ध्यान-
चीता परियोजना की सफलता के लिए चीतों को सुरक्षित प्राकृतिक आवास, पर्याप्त भोजन और अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराना आवश्यक है। इसके लिए वन विभाग द्वारा शिकार प्रजातियों की उपलब्धता बढ़ाने और वन्यजीवों की नियमित निगरानी पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

अभयारण्य के चीता बोमा क्षेत्र में पहले चीतल और काले हिरण छोड़े जा चुके हैं। इसी क्रम में सोमवार, 2 नवंबर को नीलगाय और काले हिरण भी अभयारण्य में छोड़े गए। प्राप्त जानकारी के अनुसार, अब तक यहां कुल 372 काले हिरण और 179 नीलगाय छोड़ी जा चुकी हैं।

इन वन्यप्राणियों को उज्जैन से विशेष रूप से प्रशिक्षित दल द्वारा वाहनों के माध्यम से गांधीसागर लाया गया। वन विभाग को उम्मीद है कि नीलगाय की मौजूदगी से शिकार प्रजातियों की उपलब्धता और प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में मदद मिलेगी। साथ ही, चीतों के भोजन के लिए उपलब्ध शिकार प्रजातियों में विविधता भी बढ़ेगी।

बोमा में चार चीते, सुरक्षा के लिए 24 घंटे निगरानी

गांधीसागर अभयारण्य के बोमा क्षेत्र में वर्तमान में चार चीते मौजूद हैं, जिनमें दो नर और दो मादा चीते शामिल हैं। प्रशासन अब इन चीतों की ब्रीफिंग होने का इंतजार कर रहा है। उनकी सुरक्षा और स्वास्थ्य की निगरानी के लिए चिकित्सकीय दल के साथ वन विभाग की टीमें अलग-अलग पारियों में 24 घंटे तैनात की गई हैं। स्वयं डीएफओ संजय रायखेरे भी यहां मौजूद रहकर चीतों की बसाहट और सुरक्षा व्यवस्थाओं पर नजर रखे हुए हैं।

जैव विविधता से मजबूत होगा अभयारण्य का पारिस्थितिकी तंत्र-
किसी भी अभयारण्य की सफलता केवल एक विशेष वन्यजीव प्रजाति की मौजूदगी से नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन से तय होती है। चीतों के साथ चीतल, काले हिरण, नीलगाय और अन्य वन्यप्राणियों की मौजूदगी गांधीसागर के प्राकृतिक महत्व को और बढ़ाती है।

वन्यजीवों के लिए पर्याप्त भोजन, स्वच्छ जलस्रोत, सुरक्षित विचरण क्षेत्र और अनुकूल घास के मैदान उपलब्ध कराना संरक्षण की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। इन व्यवस्थाओं का बेहतर संचालन ही भविष्य में गांधीसागर अभयारण्य को वन्यजीव संरक्षण के एक मजबूत केंद्र के रूप में स्थापित करने में सहायक होगा।

राष्ट्रीय पहचान के साथ बढ़ेंगी पर्यटन की संभावनाएं-
चीता परियोजना के कारण गांधीसागर अभयारण्य को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली है। आने वाले समय में यहां वन्यजीव पर्यटन की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं। इसके लिए वन विभाग के सामने वन्यजीवों की सुरक्षा, प्राकृतिक जलस्रोतों का संरक्षण, घास के मैदानों का विकास, अवैध गतिविधियों पर नियंत्रण और पर्यटकों के लिए आवश्यक सुविधाओं का विस्तार जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां हैं।

गांधीसागर अभयारण्य में वन्यजीवों का बढ़ता कुनबा संरक्षण की दिशा में सकारात्मक संकेत है। अब इन प्रयासों को निरंतर जारी रखते हुए प्राकृतिक आवास और जैव विविधता को सुरक्षित रखना जरूरी है, ताकि गांधीसागर आने वाले वर्षों में चीता परियोजना के साथ संपूर्ण वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में भी देशभर में अपनी विशिष्ट पहचान बना सके।

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