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November 22, 2022, 8:32 pm
BIG REPORT : आफत में नीमच, कौन पूछे सवाल, पढ़िए जर्नलिस्ट मुस्तफा हुसैन की कलम से ये ख़ास रिपोर्ट 

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जब कोई भी राजनैतिक दल लम्बे समय तक सत्ता में रहता है तो उसके नेता बेलगाम हो जाते है और उनको ये खुशफहमी हो जाती है की वे आदि अनादि काल तक सत्ता का सुख भोगते रहेंगे जब विकास के मुद्दों और सत्ता में बैठे नेताओ के रिपोर्ट कार्ड से इतर किसी लहर पर वोट पड़ते है तो नेताओ को लगता है की उन्हें काम करने की क्या ज़रूरत है फिर कोई मुद्दा लहर का रूप लेगा और हम सत्ता में पहुँच जाएंगे 

यदि हम गहराई से आकलन करे तो सत्तासीन भाजपा नेता ठीक उसी अंदाज़ में काम करते है उन्हें भरोसा है की जब काम के आकलन पर वोट पड़ते ही नहीं है तो फिर काम क्यों करे यदि उन्हें उनके खिलाफ वोट पड़ने का डर होता तो जनहित के कामो के लिए वे ज़मीन - आसमान एक कर देते लेकिन अब ऐसा नहीं होता 

अब नेता सुबह ट्रेक सूट पहन कर दिन चढ़ने तक दस से बारह चाय की दुकानों पर चाय पीते है फिर नहाकर शादी - ब्याव जैसे कार्यक्रमों में चले जाते है और यह सिलसिला देर शाम तक चलता है वोटर कितने भोले और मासूम है की वे नेता को चाय की दुकानों और शादी ब्याव के मंडपों में देखकर खुश होते है और कहते है कितने बढ़िया नेता है सब जगह आते है लेकिन इन वोटरों ने कभी इस बात पर गौर नहीं किया की इन नेताओ को सत्ता में अमूल्य वोट देकर इसलिए नहीं बिठाया है की ये पूरे दिन घुमते फिरे, इनको सत्ता में इसलिए पहुंचाया है की ये प्रशासनिक अफसरों पर अपनी लगाम लगाए और जनहित के काम करवाए 

इन नेताओ से पूछा जाए की श्रीमान आपने आखरी बार सरकारी विभागों की समीक्षा कब की तो ये बगले झाँकने लगेंगे इनसे यदि इनके क्षेत्र के ज्वलंत मुद्दों पर सवाल पूछ लिए जाए तो इनको उसकी कोई जानकारी नहीं होगी जबकि कोई सफल और अच्छा नेता तब होता है जब जनहित के मुद्दों पर उसकी पूरी पकड़ हो ताकि सरकारी मशनरी को वो ज्ञान बाँट सके लेकिन ये ज्ञान लेने के लिए सर खपाना पड़ता है घंटो माथा पच्ची करना पड़ती है बिना होमवर्क के आप अफसरों को क्या ज्ञान बांट पाओगे और ऊपर भोपाल में बैठे अपने बड़े नेताओ से कैसे काम करवा पाओगे 

सरकार के स्तर पर दो तरह से काम होते है एक तो वो काम जो सरकार पूरे प्रदेश के लिए योजना लाती है और एक वो काम जो आपने अपने एफर्ट से अपने क्षेत्र में करवाया इन नेताओ से इस बात का रिपोर्ट कार्ड भी लिया जाना चाहिए की श्रीमान आपने जमीन पर अपने प्रयासों से क्या क्या काम करवाए 

सरकार विधायकों और सांसदों को निधि देती है किसी भी आम आदमी को एक दो करोड़ दे दो और उसे खर्च करने की कहो वो भी ये काम कर देगा इन निधियों को खर्च करना कोई बड़ा कारनामा नहीं कारनामा तो तब कहलाता है जब आप अपने दम पर कोई कार्य करवाते है आज स्व सीताराम जाजू को पूरा शहर याद करता है क्योकि उन्होंने उस समय दूर दृष्टि रखकर जाजू सागर बनवाया उस डेम के बाद और किसी नए डेम का निर्माण नीमच की प्यास बुझाने के लिए नहीं हो पाया ऐसे ही स्व वीरेंद्र कुमार सखलेचा जिनके समय में नीमच में स्विमिंग पुल बना उस समय यह स्विमिंग पुल पूरे एमपी में सबसे बड़ा स्विमिंग पुल था आज सैंकड़ो बच्चे इस स्विमिंग पुल में प्रेक्टिस कर नीमच का नाम देश में रोशन कर रहे है सोचिये इतने साल पहले उनका विज़न क्या रहा होगा 

लेकिन यदि बीते बीस सालो की बात करे तो ऐसा विज़नरी नेता दूर दूर तक दिखाई नहीं देता जिसने नीमच शहर को कुछ ऐसा दिया हो जिसे आने वाले 100 साल तक याद किया जा सके उलटा नीमच से सुविधाएं छिनती चली गयी एक ज़माने में नीमच का पश्चिम रेलवे में एहतराम से नाम लिया जाता था आज एक मामूली रेलवे स्टेशन से अधिक नीमच कुछ नहीं यहाँ से लोको शेड जाने के बाद यह रेलवे स्टेशन बेरौनक हो गया 

ऐसे मुद्दों की फेहरिस्त लम्बी है आज एजुकेशन हो या फिर मेडिकल फेसेलिटी मंदसौर और चित्तौड़ जैसे शहरो के सामने हम कही नहीं ठहरते आज मंदसौर के जिला अस्पताल और नीमच के जिला अस्पताल की तुलना की जाए तो मंदसौर के सामने हमारा जिला अस्पताल एक चौथाई हैसियत नहीं रखता और तो और कई बिमारी ऐसी है जिनके डॉक्टर तक इस अस्पताल में नहीं आमतौर पर मुझे पता चलता है की नीमच से लोग ईलाज कराने मंदसौर और चित्तौड़ जाते है 

इन नेताओ से सवाल पूछा जाना चाहिए की आखिर इन सब के लिए जनता किसको जिम्मेदार ठहराए, नीमच की एक मात्र शासकीय सीमेंट फैक्ट्री सीसीआई नयागांव साज़िशों की भेंट चढ़ गयी और प्राइवेट विक्रम सीमेंट फैक्ट्री नीमच के बेरोजगारों को नौकरी नहीं देती ये नेता बताये की बेरोजगारों के लिए आज तक किसी नए उद्योग को क्यों नहीं लाया जा सका नीमच मंडी की बदहाली किसी से छुपी नहीं एक दिन था जब मंदसौर मंडी नीमच मंडी के सामने पानी भरती थी लेकिन आज मंदसौर मंडी का डंका पूरे एमपी में बजता है 

लेकिन इन सवालों का जवाब कौन देगा और कौन इन नेताओ से पूछने की हिम्मत करेगा, क्योकि हम सवाल पूछने का हौंसला खो चुके है

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