चित्तौड़गढ़। ठाकुर श्री कल्लाजी के कृपा पात्र गौनन्दन पंडित विकास नागदा ने कहा कि पंचम वेद के रूप में श्रीमद् भागवत महापुराण में वर्णित भगवान श्री कृष्ण की बाल लीलाओं से गौसेवा का संकल्प ले, ताकि भारत एक बार फिर गौरक्षक बनने के साथ ही विश्व गुरू का स्थान पा सके। पंडित नागदा रविवार को श्री कल्लाजी वेदपीठ एवं शोध संस्थान द्वारा वेदपीठ परिसर निम्बाहेड़ा में आयोजित श्रीमद् भागवत ज्ञान गंगा महोत्सव के पंचम दिवस व्यासपीठ से संबोधित कर रहे थे। उन्होंने वेद लक्षणा गौमाता की महिमा को बखान करते हुए कहा कि प्रत्येक देशी गाय में सप्त गुण होते हैं। जिनके माध्यम से हमारा जीवन धन्य हो सकता हैं। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की माखन लीला का विस्तार करते हुए कहा कि अपने नटखट स्वरूप में वे गौकुल के हर घर में ग्वालटोली के साथ माखन चोरी कर खाते हुए यह संदेश देते है कि हमेशा गौरस का पान करने से स्वस्थ्य शरीर होने के साथ ही जीवन चिरायू बनता है। इस दौरान गौकुल की गोपिकाओं द्वारा मय्या यशोदा के पास काना की माखन चोरी की शिकायत करने पर बालकृष्ण हर चोरी के लिए मना करते हुए कहते है कि यह सब गोपिकाएं है, यूहीं उलाहना दे रही हैं। मय्या मैं नहीं माखन खायों कहकर यशोदा को संतुष्ट कर देते हैं। इस दौरान श्रीकृष्ण द्वारा ब्रज की माटी खाने की दाऊ द्वारा शिकायत करने पर जब मय्या यशोदा कृष्ण को मूंह खोलने की कहती है तो मय्या यशोदा को समूचे ब्रह्माण्ड के दर्शन हो जाते है। जिसमें कान्हा यशोदा भी दिखाई देते है, तब मय्या यशोदा भ्रमित हो जाती है, लेकिन बालकृष्ण ने अपनी ऐश्वर्य लीला को समेट कर माधूर्य लीला के माध्यम से उसी नटखट रूप में दिखाई देने लगते हैं। पंडित नागदा ने श्रीकृष्ण की दामोदर लीला के साथ ही वृंदावन के प्रकृति स्वरूप का विस्तार से वर्णन करते हैं। जहां वृंदा यानि तुलसी के घने पौधे दिखाई देते हैं। इसी क्रम में उन्होंने कहा कि जिस घर में तुलसी और शालिग्राम स्थापित हो वह घर वृंदावन से कम नहीं होता हैं। पंडित नागदा ने बालकृष्ण द्वारा पुतना वध के साथ ही व्रतासुर, सक्टासुर, भगासुर, आगासुर के वध के अलावा यमलार्जुन को मुक्ति देने का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने कहा कि जब ब्रह्मा जी ने ग्वालबालों के साथ गौकुल के गौवंश को भी हरण लिया तो श्री कृष्ण ने अपनी लीला से उसी स्वरूप में उन्हें फिर से प्रकट कर लिया, जब एक वर्ष बाद ब्रह्मा जी लौटे तो वहीं हाल देखकर चकित होकर उन्होंने प्रभु की शरणागति कर ली। पंडित नागदा ने गोवर्धन लीला को विस्तार से बताते हुए कहा कि गौकुल एवं वृंदावन में अच्छी वर्षा की कामना के लिए इन्द्र की पूजा करने के लिए नन्द यशोदा सहित गोकुल वासियों की तैयारियों को देखकर श्रीकृष्ण ने इन्द्र की बजाय गोवर्धन की पूजा करने का आग्रह किया। जिस पर इन्द्र ने कुपित होकर मेघों को भेजकर क्षेत्र में घनघोर वर्षा की शुरूआत की, जिसके बचाव के लिए श्रीकृष्ण ने अपने बाल सखाओं के साथ गोवर्धन को अपनी ऊंगली पर धारण कर सात दिन तक गौकुल वृंदावन की रक्षा कर इन्द्र का मानमर्दन कर दिया। श्री कृष्ण द्वारा सात दिन तक बिना खाए गोवर्धन पर्वत धारण करने पर वे गोवर्धननाथ कहलाएं और आठवें दिन उन्हें प्रतिदिन आठ प्रकार के भोग को मिलाकर छप्पन भोग न्यौछावर किया गया। इसी प्रसंग को लेकर आज भी मंदिरों में छप्पन भोग लगाने की परंपरा प्रचलित हैं। कथा के इस प्रसंग के दौरान जीवन्त झांकी के रूप में श्रीकृष्ण एवं ग्वालबालों ने गोवर्धन पर्वत को धारण किया। वहीं छप्पनभोग की झांकी ने दर्शकों को मोहित कर दिया। इस बीच पंडित नागदा एवं स्वर सम्राट पंडित प्रहलाद कृष्ण एवं साथियों द्वारा आओं जी ठाकुर भोग लगाओं, छप्पनभोग तैयार जी भजन के माध्यम से ठाकुर जी का आह्वान करते हुए भोग को धराया गया। उन्होंने कथा के दौरान कई मनभावन भजनों की प्रस्तुति देकर परिसर को भक्तिरस से सराबोर कर दिया। तत्पश्चात वेदपीठ के प्रतिनिधि दिलीपसिंह के आग्रह पर श्रद्धालुओं द्वारा श्रीमद् भागवत की महा आरती के साथ कथा का विश्राम हुआ।