चित्तौड़गढ़। ठाकुर श्री कल्लाजी के कृपा पात्र गौनन्दन पंडित विकास नागदा ने कहा कि श्री मद् भागवत महापुराण में वर्णित महारास, वेणुगीत और गोपी उद्धव संवाद हर दृष्टि से प्रेमा भक्ति के प्रतीक है। जिनसे हमें प्रेरणा लेकर अपने आराध्य के प्रति पूरे समर्पण भाव से प्रेमा भक्ति करनी चाहिए। पंडित नागदा सोमवार को श्री कल्लाजी वेदपीठ एवं शोध संस्थान निम्बाहेड़ा द्वारा वेदपीठ परिसर में आयोजित श्रीमद् भागवत ज्ञान गंगा महोत्सव के षष्ठम दिवस व्यासपीठ से संबोधित कर रहे थे। उन्होंने महारास का विस्तार से वर्णन करते हुए कहा कि शरद पूर्णिमा की धवल चांदनी में जब बृज में महारास का आयोजन किया गया तो कान्हा की बांसूरी सुनकर बृज की समस्त गोपीयां सुध-बुध खोती हुई महारास में पहुंच गई, तब भगवान कृष्ण ने कहा कि वे भी गोपियों के अन्यय प्रेम भाव को महत्व देते है। इसी दौरान गोपियों ने श्रीकृष्ण से अधरामृत प्रदान करने का अनुनय आग्रह किया। जिसे स्वीकारने पर वेणुवादन के साथ महारास का भव्य आयोजन हुआ। इससे पूर्व पंडित नागदा ने कंस वध की विस्तार से व्याख्या करते हुए कहा कि मथुरा में कंस के बढ़ते पाप को समाप्त करने के लिए मल्लयुद्ध में उन्हें पराजित कर अपने धाम को पहुंचा दिया। वहीं भगवान कृष्ण मथुरा में विराजित हो गए तब अपने सखा उद्धव से कहा कि उन्हें बृज की बहुत याद आ रही हैं। इसलिए वे बृज जाकर गोपियों को मेरे प्रेम का संदेश दे, तब उद्धव ने श्रीकृष्ण का ऊपरणा ओढ़कर वे बृज पहुंचे तो समस्त ग्वालबाल रथ को देखकर अपने कान्हा को आया समझ बैठे, लेकिन वहां तो कान्हा नहीं उद्धव पहुंचे थे। जब उद्धव मय्या यशोदा और नन्द बाबा के पास पहुंचे तो उनकी दशा भी कान्हा के विरह में देख कर वे भी चकित हो गए। तत्पश्चात वे गोपियों से मिलने पहुंचे तो लाख समझाने के बावजूद गोपियों ने उनसे कहा उद्धव मन नाही दसबीस एक हो तो जो गयो श्याम संग यह कहकर उद्धव को निरूत्तर कर दिया। इस प्रसंग ने श्रीकृष्ण एवं गोपियों के प्रेम भक्ति भाव को प्रकट कर दिया। छह माह बृज में रहने के बाद जब उद्धव मथुरा गए तो उन्होंने ने भी श्री कृष्ण को उलाहना देते हुए कहा कि बृज में तुम्हें इतना प्रेम करने वाले है, तो वहां क्यों नहीं चले जाते तब श्रीकृष्ण ने कहा कि यह असंभव है, लेकिन गोपियों के आनंद प्रेम को स्वीकार करते हुए उन्होंने उसी रूप में उन्हें दर्शन भी दिए। जब कृष्ण मथुरा छोड़कर द्वारिका जाने लगे तो वहां युद्ध को छोड़ने के कारण वे रणछौड़ कहलाएं। पंडित नागदा ने रूकमणी मंगल की कथा का विस्तार करते हुए कहा कि रूकमणी द्वारा प्रेम निवेदन करने के बाद भगवान कृष्ण ने उनका अपहरण कर प्रेम विवाह किया। इसके साथ ही रूकमणी उनकी प्रथम पटरानी बन गई। कृष्ण रूकमणी विवाह के प्रसंग के दौरान पंडित नागदा एवं पंडित प्रहलाद कृष्ण एवं साथियों द्वारा जब कथा मंडप में आए सजीव रूकमणी कृष्ण की झांकी के साथ बन्नो मारो चारभुजा को नाथ, बन्नी मारी तुलसा लाड़ ली की तर्ज पर भजन की प्रस्तुति दी तो कथा मंडप में मौजूद श्रद्धालु नर नारी नृत्य करने लगे। कथा विश्राम से पूर्व मौजूद श्रोताओं ने स्वेच्छानुसार कृष्ण रूकमणी को उपहार न्यौछावर कर स्वयं को धन्य किया। वहीं कृष्ण रूकमणी विवाह का चरित्र वर्णन एवं सजीव प्रदर्शन दर्शकों के लिए विशेष आकर्षण का केन्द्र रहा। अंत में वेदपीठ के पदाधिकारियों एवं भक्तों ने श्रीमद भागवत महापुराण की महा आरती की।