चित्तौड़गढ़। गांधीनगर स्थित नानू नवकार भवन में चातुर्मासिक प्रवचन करते हुए शांतक्रांति संघ की विदुषी महासती शीलप्रभा ने कहा कि जिस तरह कच्ची मिट्टी से कुम्हार अपनी इच्छा अनुसार विभिन्न आकार के बर्तन तैयार कर सकता है उसी तरह बचपन में यदि बालक बालिकाओं को अभिभावक संस्कारों की शिक्षा देने और दिलाने हेतु जागरूक रह कर बाल्यावस्था में संस्कारों का बिजारोपण करने हेतु सजग रहें तो इससे बच्चे के जीवन का नैतिक और चारित्रिक विकास अच्छी तरह होता है, जो उसके जीवन को आदर्श की तरफ ले जाने वाला बनता है । जब तक जीवन संस्कारित नहीं होता है तब तक व्यक्तित्व का पूर्ण विकास नहीं हो सकता है। अतः हमें चाहिए कि हम अपने बच्चों को संस्कार प्राप्ति हेतु योग्य गुरुजनों के सानिध्य में अथवा संस्कार शिविर में ज़रूर भेजें। जिससे कि बच्चों का सर्वांगीण विकास हो और आगे चल कर वे समाज के कर्णधार बन कर दूसरों के लिए प्रेरणा स्रोत बन सकें । साध्वी रत्ना राजश्री जी म सा आदि ठाना 5 के पावन सानिध्य में नानू नवकार भवन में बालिकाओं हेतु संस्कार शिविर गतिमान है। जिसमें नैतिक जीवन निर्माण एवं चारित्रिक विकास की छोटी छोटी बातों को बारीकी से समझाया जा कर सफल जीवन जीने की सम्यक रीति का परिचय कराया जा रहा है। इससे पूर्व महासती सत्यप्रभा ने उत्तराध्यायन सूत्र के 32 वे अध्ययन के माध्यम से बताया कि हमें कदम कदम पर अप्रमत्त बनने की कोशिश करते हुए प्रमाद अवस्था को निरंतर कम करने हेतु सज़ग रहना चाहिए। महासती पुण्यप्रिया ने जीवजीवाभिगाम सूत्र में वर्णित अढ़ाई द्वीप के सूर्य एवं चंद्र के विषय में जानकारी दी । धर्म सभा में शिविरार्थी बालिका संगीता एवं पारुल सेठिया ने संस्कार प्राप्ति को आज की प्रमुख आवश्यकता बताया। साध्वी रत्ना राजश्री जी म सा ने विभिन्न प्रत्याख्यान कराने के बाद मंगल पाठ सुनाया। संचालन संघ मंत्री इन्द्रेश कोठारी ने किया।