चित्तौड़गढ़। कलियुग में भगवान के नाम का स्मरण ही मनुष्य के लिए सबसे सरल, सहज और प्रभावी साधन है। मृत्यु जीवन का अटल सत्य है, जिससे कोई बच नहीं सकता, लेकिन भगवान की कथा, सत्संग और नाम-स्मरण मनुष्य को मृत्यु के भय से मुक्त कर उसके जीवन एवं अंत समय को मंगलमय बना देते हैं। यह उद्गार भागवताचार्य वैदिक पंडित राजेंद्र शास्त्री (रिछावरा वाले) ने शुक्रवार को श्रीमद्भागवत ज्ञान गंगा महोत्सव के द्वितीय दिवस पर व्यक्त किए।
शुभ लाभ कॉलोनी (भंडारिया रोड, श्याम नगर के आगे) स्थित ‘राधे-कृष्ण कुंज’ में 18 से 24 जून तक आयोजित श्रीमद्भागवत महापुराण कथा में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु कथा-रस का श्रवण कर रहे हैं। कथा के दूसरे दिन भागवताचार्य ने कलियुग की विशेषताओं का वर्णन करते हुए कहा कि यह युग कर्मों का त्वरित फल देने वाला युग है। मनुष्य अपने शुभ और अशुभ कर्मों का परिणाम कई बार इसी जीवन में प्राप्त कर लेता है। इसलिए स्वर्ग और नरक की अनुभूति भी व्यक्ति अपने कर्मों के अनुसार इसी संसार में कर सकता है।
उन्होंने कहा ष्कलियुग केवल नाम अधारा, सुमिर-सुमिर नर उतरहिं पारा।ष् शास्त्रों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि कलियुग में भगवान के नाम का स्मरण ही भवसागर से पार उतरने का सर्वाेत्तम साधन है। जो व्यक्ति श्रद्धा और विश्वास के साथ नियमित रूप से प्रभु का नाम जपता है, उस पर भगवान की कृपा सहज ही बरसती है।
भागवताचार्य ने राजा परीक्षित और कलियुग के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण के स्वधाम गमन के बाद कलियुग का प्रभाव प्रारंभ हुआ। उन्होंने कहा कि हम सभी भी जीवन के केवल सात दिनों- रविवार से शनिवार के चक्र में जी रहे हैं। इनमें से कौन-सा दिन जीवन का अंतिम दिन होगा, यह किसी को ज्ञात नहीं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को मृत्यु का स्मरण रखते हुए अपने जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि सत्संग और कथा मृत्यु को रोक नहीं सकते, लेकिन मृत्यु को मंगलमय अवश्य बना देते हैं। बिल्ली और उसके बच्चे का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि जैसे बिल्ली चूहे को पकड़ती है तो वह तड़पता है, जबकि अपने बच्चे को बड़े स्नेह से एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती है। उसी प्रकार भगवान की कथा और नाम-स्मरण करने वाले भक्त के लिए मृत्यु सहज हो जाती है, जबकि ईश्वर-विमुख व्यक्ति अधिक कष्ट का अनुभव करता है।
राजेंद्र शास्त्री ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि केवल भोगी या योगी बनने की अपेक्षा जीवन में उपयोगी बनने का प्रयास करें। वृक्ष फल, छाया और लकड़ी देकर दूसरों के काम आते हैं, नदियां प्यास बुझाती हैं और गौमाता दूध देकर मानवता का कल्याण करती है। उसी प्रकार मनुष्य को भी सेवा, परोपकार और मानव कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि अंतिम समय में वही स्मरण होता है, जिसका अभ्यास जीवनभर किया गया हो। यदि जीवन में भगवान के नाम का अभ्यास नहीं किया गया तो मृत्यु-शय्या पर अचानक नाम-स्मरण करना कठिन हो जाता है। इसलिए दैनिक जीवन के प्रत्येक कार्य के साथ प्रभु का स्मरण करते रहना चाहिए।
कथा विश्राम के अवसर पर श्रद्धालुओं ने जयघोष के साथ भगवान श्रीकृष्ण, श्री शुकदेव मुनि एवं राजा परीक्षित के चरित्रों से प्रेरणा लेकर धर्म, भक्ति, सेवा और सदाचार के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।
आयोजन समिति के अनुसार 23 जून को रात्रि 8 बजे बालाजी मित्र मंडल, दलोट द्वारा संगीतमय सुंदरकांड पाठ प्रस्तुत किया जाएगा, जबकि 24 जून को सायं 4 बजे पूर्णाहुति के साथ महोत्सव का समापन होगा।