नीमच। जब देश का नागरिक अपने घरों में चैन की नींद लेता है, तब एक सैनिक सीमाओं पर दुश्मनों की निगाहों से देश की रक्षा कर रहा होता है। वह सिर्फ बंदूक चलाने वाला नहीं, बल्कि सुपरसोनिक जेट उड़ाने वाला, अत्याधुनिक मिसाइल सिस्टम को ऑपरेट करने वाला, एडवांस्ड कम्युनिकेशन और लॉजिस्टिक्स को संभालने वाला एक तकनीकी योद्धा होता है। लेकिन जैसे ही वह फौज से रिटायर होता है, अगले ही दिन समाज उसे केवल एक छोटे से पद की नौकरी के लायक समझता है। यह कितनी बड़ी विडंबना है कि जो व्यक्ति देश की सुरक्षा में जीवन का सबसे श्रेष्ठ समय दे आता है, उसे शांति के समय उपेक्षा और अपमान का सामना करना पड़ता है। उसकी योग्यता, अनुभव और तकनीकी दक्षता को नजरअंदाज कर दिया जाता है। युद्ध के समय तो हम सैनिकों को सिर आंखों पर बैठा लेते हैं, लेकिन युद्ध खत्म होते ही हम उन्हें समाज के सबसे निचले दर्जे की नौकरी तक सीमित कर देते हैं। क्या यही है एक सैनिक के बलिदान का मूल्य? क्या यही है राष्ट्र की कृतज्ञता? जब तक हम अपने सैनिकों को उनके सेवा काल के बाद भी वही सम्मान, वहीं अवसर और वहीं गरिमा नहीं देंगे, तब तक हम एक संवेदनशील और जिम्मेदार समाज कहलाने के योग्य नहीं हैं। जो सैनिक युद्धभूमि में शत्रु से नहीं डरता, वह रिटायरमेंट के बाद अपमान से भी नहीं डरता, पर क्या हम उसके इस सहने की ताकत का बार-बार अनुचित लाभ उठाते रहेंगे?
यह बात बोरदिया कला के कमलेश शर्मा ने कही। उन्होंने कहा कि आज जब भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव की स्थिति है, तो वही समाज, वहीं लोग जो सामान्य दिनों में सैनिकों को नजरअंदाज करते हैं, अब “युद्ध! युद्ध!” चिल्ला रहे हैं। सोशल मीडिया पर बैठकर की बोर्ड से देशभक्ति दिखाने वालों से पूछना चाहिए कि क्या उन्होंने कभी उस सैनिक की आंखों में झांककर देखा है जो युद्ध की आग में अपने प्राणों की बाज़ी लगाता है? क्या उन्होंने कभी सरहद की बर्फीली रातें देखी हैं, जहाँ इंसान की सांस भी जम जाती है, मगर सैनिक तैनात रहता है? युद्ध कोई वीडियो गेम नहीं है, न ही किसी फिल्म का सीन है जिसे देखकर तालियां बजाई जाएं। युद्ध का सबसे बड़ा मूल्य वही चुकाता है जो मोर्चे पर होता है। वो सैनिक, जो अपने पीछे एक बूढ़े मां-बाप, एक बेसब्र पत्नी और मासूम बच्चों को छोड़कर जाता है जो लोग आज वॉर का नारा लगाते हैं, वे शायद ये भूल जाते हैं कि युद्ध का मतलब है खून, दर्द, मातम और लाशों की कतारें। आतंकवाद हो या कोई और दुश्मन देश जवाब ज़रूरी है, लेकिन जवाबी कार्यवाही का निर्णय उस फौजी की जान की कीमत पर नहीं होना चाहिए, जो बिना सवाल किए आदेश का पालन करता है। एक सैनिक जानता है युद्ध का असली चेहरा उसने देखा है दोस्त की आंखों के सामने दम तोड़ती सांसें, उसने उठाए हैं उन वीरों के शव जो कभी हंसते हुए साथ लड़े थे। इसलिए जो लोग देशभक्ति को युद्ध की भाषा में तौलते हैं, उनसे एक सवाल है कि क्या उन्होंने अपने घर का जवान खोया है? क्या उन्होंने रात को तिरंगे में लिपटा शरीर उठाया है? नहीं ना? तो कृपया थोड़ा सम्मान उस सैनिक के लिए भी बचाकर रखें जो गोली चलाने से पहले हजार बार सोचता है। क्योंकि वो जानता है कि हर गोली के जवाब में किसी मां की गोद सूनी होगी, किसी बच्चे का बचपन टूटेगा। सच्ची देशभक्ति युद्ध भड़काने में नहीं, शांति बनाए रखने और सैनिक के बलिदान का आदर करने में है।