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November 21, 2025, 2:06 pm
NEWS : भारतीय वैज्ञानिकों ने रचा इतिहास, इसरो के वैज्ञानिकों ने माउंट आबू से देखा धूमकेतु, आखिर क्या रहस्य छुपा है इस धूमकेतु में वैज्ञानिक सुनील चंद्र ने किया खुलासा, पढे़ खबर

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माउंट आबू। भारतीय वैज्ञानिकों ने एक नया इतिहास रच दिया है। भारतीय वैज्ञानिकों ने माउंट आबू स्थित टेलिस्कोप से इंटरस्टेलर धूमकेतु 3I/ATLAS का ऑब्जर्वेशन किया। यह तीसरा ज्ञात धूमकेतु है जो किसी दूसरे स्टार सिस्टम से आया ह।  इमेजिंग और स्पेक्ट्रल डेटा से इसकी संरचना और असामान्य केमिस्ट्री का पता चला है। हमारे संवाददाता  ने खोज करनेवाले टीम के माउंट आबू भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला के प्रमुख एवं प्रभारी  वैज्ञानिक सुनील चंद्र से खास बातचीत की।

जिस रहस्यमय धूमकेतु ने दुनिया का दिमाग घुमाया, उसे ISRO ने माउंट आबू से दबोचा, जानिए आखिर क्या और कैसे हुआ ये। भारत के वैज्ञानिकों ने रचा इतिहास, माउंट आबू से रहस्यमय धूमकेतु की खींची तस्वीर।  माउंट आबू स्थित PRL का 1.2-मीटर टेलीस्कोप 1680 मीटर की ऊंचाई पर गुरूशिखर के पास स्थापित है और इसका उपयोग एक्सोप्लानेट खोज, उच्च-ऊर्जा घटनाओं और सौरमंडल अनुसंधान में किया जाता है। हमारे संवाददाता  ने माउंट आबू भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला वेधशाला के प्रमुख एवं प्रभारी इस खोज टीम के वैज्ञानिक सुनील चंद्र से की खास बातचीत की । उन्होंने बताया कि  यह हमें हमारे सूर्य के बाहर बने मैटर के बारे में दुर्लभ जानकारी देगा। PRLके वैज्ञानिकों ने बताया कि जैसे-जैसे धूमकेतु गहरे रात वाले हिस्से में प्रवेश करेगा, उसके और भी उच्च-गुणवत्ता वाले अवलोकन जारी रहेंगे। माउंट आबू स्थित PRL का 1.2-मीटर टेलीस्कोप 1680 मीटर की ऊंचाई पर गुरूशिखर के पास स्थापित है और इसका उपयोग एक्सोप्लानेट खोज, उच्च-ऊर्जा घटनाओं और सौरमंडल अनुसंधान में किया जाता है।


इसरो (ISRO) और फिज़िकल रिसर्च लेबोरेटरी (PRL) के वैज्ञानिकों ने माउंट आबू स्थित 1.2 मीटर टेलीस्कोप की मदद से इंटरस्टेलर धूमकेतु 3I/ATLAS का सफलतापूर्वक अवलोकन किया है। यह धूमकेतु सूर्य के नज़दीकी बिंदु को पार करने के बाद अब आंतरिक सौरमंडल से बाहर की ओर बढ़ रहा है। 12 से 15 नवंबर 2025 के बीच माउंट आबू स्थित 1.2 मीटर टेलीस्कोप की मदद से धूमकेतु की इमेजिंग और स्पेक्ट्रोस्कोपी दोनों मोड में विस्तृत अध्ययन किया। आइए जानते और समझते है कि इस खोज के क्या मायने है।


फॉल्स कलर छवि (चित्र-1) में धूमकेतु का गोल आकार का कोमा स्पष्ट दिखाई देता है। कोमा धूमकेतु के नाभिक के चारों ओर बनने वाली धुंधली, चमकीली गैस और धूल की परत होती है, जो सूर्य की गर्मी से बर्फ पिघलने पर बनती है। वर्तमान अवलोकन ज्यामिति के अनुसार धूल की पूंछ, यदि मौजूद हो, तो पृथ्वी से देखने पर सूर्य की दिशा के उलट यानी धूमकेतु के पीछे की ओर होगी। इमेजिंग के साथ ही वैज्ञानिकों ने सुबह के उजाले से पहले धूमकेतु का स्पेक्ट्रम भी रिकॉर्ड किया। धूमकेतु विज्ञान की भाषा में नाभिक से गैसों के निकलने की दर को 'प्रोडक्शन रेट' कहा जाता है. यह धूमकेतु की गतिविधि का प्रमुख संकेतक होता है। 

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