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July 29, 2023, 4:36 pm
KHABAR : मानव पाप कर्म के बोझ के कारण ही दुर्गति का पात्र होता है- मुनिश्री दर्शित सागर, बड़ी संख्या में उपस्थित समाजजन ने लिया धर्मसभा का लाभ, पढ़े खबर    

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सिंगोली। भगवान का नाम ही संसार के दुःखों से बचा लेता है, उनके पूरे स्तवन की जरूरत ही नहीं पडती है। भगवान के नाम स्मरण मात्र से मन और वचन की विशुद्धता बढ़ती है और इष्ट वस्तु की प्राप्ति होती है। समवशरण में सौधर्मइन्द्र भगवान की एक हजार आठ नामों से स्तुति करता है और अपने आपको धन्य मानता है यह बात नगर में चातुर्मास हेतु विराजमान आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज से शिक्षित व वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज से दिक्षीत मुनिश्री सुप्रभ सागर जी महाराज ने 29 जुलाई शनिवार को प्रातः काल धर्मसभा को संबोधित करते हुए कही। 
मुनिश्री दर्शित सागर जी महाराज ने कहा कि भगवान के नाम से मन की विशुद्धि होती है अर्थात् राग-द्वेष-मोह, पाप तथा कषाय के परिणाम नहीं होते हैं। वचन शुद्धि अर्थात् हितमित प्रिय वचन, आगमानुकूल वचन कहना। पाप, कषाय को बढ़ाने वाले वचनों का प्रयोग नहीं करना। इष्ट की प्राप्ति का तात्पर्य शाश्वत मोक्ष सुख है। आचार्य कहते हैं कि यदि आपको चक्रवर्ती से कुछ मांगने का अवसर मिल जाए, तो क्या उससे ज्वार, बाजरा गेहूँ मांगोगे या हीरे, जवाहरात, सोना-चांदी मांगोगे? फिर जब तीन लोक के स्वामी भगवान से मांगने का अवसर मिला है, तो नश्वर सांसारिक सुख क्या मांगना, अविनश्वर मोक्ष के सुख की अभिलाषा करो। मोक्ष सुख की कामना करने पर सांसारिक सुख अपने आप प्राप्त हो जाएगा। धान्य की प्राप्ति होने पर भूसा तो अपने आप मिल जाता है। इसलिए भगवान का नाम लेकर मात्र शाश्वत सुख की इच्छा करो। 
बाल अवधूत आचार्य श्री जिनसेन स्वामी ने कहा है कि भगवान आपमें अनन्त गुण है, हम मात्र एक हजार आठ नामों से ही मात्र स्तुति कर पा रहा हूँ, आपके ये नाम भव्य जीवों के पापों को शान्त करने वाले हैं। वहीं मुनिश्री दर्शित सागर जी महाराज ने कहा किलौकिक जीवन में व्यक्ति जितनी सावधानी रखता है, यदि उससे आधी सावधानी धार्मिक क्षेत्र में रख ले, तो उसके पाप का भार कम हो जायेगा। धर्म क्षेत्र में की गई छोटी सी भी असावधानी पाप के भार को बढाने वाली होती है। मानव पाप कर्म के बोझ के कारण ही दुर्गति का पात्र होता है। दुर्गति में जाने से बचने का सरल उपाय है, सावधानी। सावधानी हटी दुर्घटना घटी। पाप कर्म का भार इतना अधिक होता है कि वह पवित्र आत्मा को भी मलिनकर रसातल में ले जाता है। इस अवसर पर सनावद, रावतभाटा, धनगाव, थडोद, झांतला आदी जगह के समाजजन उपस्थित थे। 

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