नीमच। कर्मकाण्डीय विप्र परिषद नीमच की एक महत्वपूर्ण बैठक 4 अक्टूबर को श्री भूतेष्वर महादेव मंदिर स्थित मां अन्नपूर्णा के दरबार में सम्पन्न हुई जिसमें विप्र परिषद के सदस्यों के अलावा नीमच के विद्वानजन भी उपस्थित हुए।
बैठक में षरद पूर्णिमा पर चन्द्रग्रहण के कारण क्षीरपान के विषय में चर्चा की गई। जैसा कि विदित है कि इस वर्षषरद पूर्णिमा 28 अक्टूबर षनिवार को है और षरद पूर्णिमा की मध्यरात्रि चन्द्रमा की अमृतवृष्टि उपरांत खीर का भोग लगाकर प्रसाद वितरण किया जाता है, किन्तु इस वर्ष षरद पूर्णिमा पर चन्द्रग्रहण होने से खीरपान किया जाना उचित नहीं है। इस चन्द्रग्रहण का सूतक 28 अक्टूबर को दोप. 4 बजे पष्चात् लग जाएगा। चन्द्रग्रहण अर्द्धरात्रि उपरान्त 1.05 बजे से प्रारंभ होगा और मोक्ष 2.23 बजे होगा। सूतककाल एवं ग्रहणकाल में खानपान, प्रत्यक्ष पूजा निषेध रहती है, किन्तु एकान्त में भजन, जाप व मानसिक पूजा आदि का विधान षास्त्रों में बताया गया है। सूतक काल एवं ग्रहण काल में पूजा का निषेध होने से सभी मंदिरों के पट भी बंद रहते हैं। षरद पूर्णिमा को मध्यरात्रि में जो अमृतवर्षा होती है, वह भी इस वर्ष चन्द्रग्रहण होने के कारण चन्द्रमा के स्वयं दूषित व असहज होने से संभव नहीं है जबकि अमृतवर्षा ही षरद पूर्णिमा का मुख्य तत्व है। पूर्णिमा तिथि भी 28 अक्टूबर की रात्रि 1.54 तक ही है और ग्रहण की षुद्धि पूर्णिमा तिथि समाप्त होने के बाद रात्रि 2.23 बजे होगी। चन्द्रग्रहण के मोक्ष के उपरांत स्नान, अभिषेक, श्रृंगार के बाद सूतक के पहले बनी हुई खीर का लगभग 12 घंटे बाद भोग लगाना उचित नहीं है। क्योंकि भोजन तैयार होने के बाद केवल 3 घण्टे तक ही भोग लगाने लायक रहता है और वैसे भी निर्णय सिंधु के अनुसार ग्रहण के बाद सभी पका हुआ अन्न अषुद्ध व त्यागने लायक हो जाता है।
जहां तक खाद्य पदार्थों में कुषा रखकर उसका उपयोग करने की बात है, वह केवल अत्यावष्यकता में मात्र बालक, वृद्ध, रोगी, गर्भवती एवं प्रसूता के लिए ही मान्य है, सभी के लिए नहीं। इस विषय में महंत श्री अयोध्यादासजी (श्री सत्यनारायण मंदिर) एवं महंत श्री जानकीदासजी (श्री बडे बालाजी मंदिर) सहित षहर के प्रमुख मंदिरों के पुजारियों की भी सहमति है।
अतः विप्र परिषद का सर्व सम्मति से निर्णय है कि इस बार षरद पूर्णिमा पर केवल व्रत, जप, मानसिक पूजा करना षुभ है, लेकिन खीर-पान उचित नहीं माना जा सकता।
इस महत्वपूर्ण बैठक में संरक्षक पं.मालचन्द षर्मा, अध्यक्ष पं.राधेष्याम उपाध्याय, पं.चतुर्भुज षास्त्री, पं.दषरथ षास्त्री, पं.प्रेमप्रकाष गौड, पं.जगदीषप्रसाद षर्मा, पं.रामेष्वर षर्मा, पं.लक्ष्मण षास्त्री, पं.मनोज षर्मा, पं.जयप्रकाष षर्मा एवं अन्य सदस्यगण उपस्थित थे।