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November 3, 2023, 7:44 pm
KHABAR : दूसरों को अनुकूल बनाने का सबसे बढ़िया विकल्प है स्वयं अनुकूल बन जाना, आचार्य प्रसन्नचंद्र सागरजी महाराज ने कहा, प्रवचन सुनने के लिए प्रतिदिन उमड़ रही भीड़, पढ़े खबर 

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नीमच। संसार में चक्रवर्ती सम्राट का सबसे बड़ा पुण्य होता है लेकिन वह भी सबको अपने अनुकूल नहीं बना सकते। दूसरों को अनुकूल बनाने का सबसे बढ़िया विकल्प यही है कि स्वयं उनके अनुकूल बन जाए। अनुकूलता सबको अच्छी लगती है लेकिन वह दूसरों से नहीं मिलती इसके लिए स्वयं ही पहल करना पड़ती है। इसलिए जीवन में सदैव दूसरों को अनुकूल बनाने के बजाय स्वयं सबके अनुकूल बनने का लक्ष्य रखें तभी जीवन में सफलता मिलती है। तभी आत्म कल्याण का मार्ग मिल सकता है।

यह बातश्री जैन श्वेतांबर भीड़भंजन पार्श्वनाथ मंदिर ट्रस्ट श्री संघ नीमच के तत्वावधान में बंधू बेलडी पूज्य आचार्य श्री जिनचंद्र सागरजी मसा के शिष्य रत्न नूतन आचार्य श्री प्रसन्नचंद्र सागरजी मसा ने कही। वे चातुर्मास  के उपलक्ष्य में जाजू बिलिं्डग के समीप पुस्तक बाजार स्थित नवनिर्मित श्रीमती रेशम देवी अखें सिंह कोठारी आराधना भवनघ्  में आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि दूसरों को अनुकूल बनाने का दृष्टिकोण जीवन भर पूरा नहीं हो सकता लेकिन स्वयं को अनुकूल बनाने का की योजना हर व्यक्ति पूरा कर सकता है।इसलिए दूसरों को अनुकूल करने में समय शक्ति और सामर्थ्य लगाने का कोई अर्थ नहीं है ।इसमें निराशा ही मिलेगी आज लोगों में जो दूसरों को अनुकूल बनाने की मानसिकता है उसे केवल एक दृष्टि बदलने से बदला जा सकता है। दृष्टि बदलते ही पूरी सृष्टि बदल जाएगी।संसार को अनुकूल बनाना  तो दूर की बात है कोई व्यक्ति अपने परिवार को भी अनुकूल नहीं बना सकता ।यदि स्वयं को अनुकूल बनाने की कोशिश करेंगे तो परिवार ही नहीं पूरी दुनिया हमारे अनुकूल बन जाएगी। अधर्म को समझे तो धर्म का महत्व समझ आ सकता है। जहां त्याग धर्म है वहां शांति है।संसार के लोग साधन बसाते हैं फिर भी अंत में दुखी होते हैं ।साधु त्याग करता है लेकिन वह सदैव सुखी रहता है।संसार का एक भी कार्य सुख देने वाला नहीं है ।संसारी व्यक्ति पदार्थ का लेनदेन करता है। इसलिए सुख-दुख चलता रहता है ।संसार में सभी जीव दौड़ रहे हैं जैसा पुण्य करेगा वैसे ही शक्ति मिलती है। भिखारी भी अपने क्षेत्र में भटकेगा। तब भी उसे शांति नहीं मिल सकती। पैसा पाप लेकर आता है लेकिन लोग मानते नहीं है। पैसे के पीछे दौड़ रहे हैं। मनुष्य पाप के साधन एकत्र करता है। लेकिन पुण्य से दूर होता जाता है।घर में टीवी का आना पुण्य है लेकिन उसको देखना पाप कार्य होता है ।पैसा पाप का घर है इससे हमें समझना होगा।
श्री संघ अध्यक्ष अनिल नागौरी  ने बताया कि धर्मसभा में तपस्वी मुनिराज श्री पावनचंद्र सागरजी मसा एवं पूज्य साध्वीजी श्री चंद्रकला श्रीजी मसा की शिष्या श्री भद्रपूर्णा श्रीजी मसा आदि ठाणा 4 का भी  चातुर्मासिक सानिध्य मिला। समाज जनों ने उत्साह के साथ भाग लिया। उपवास, एकासना, बियासना, आयम्बिल, तेला, आदि तपस्या के ठाठ लग रहे है। धर्मसभा में जावद ,जीरन, मनासा, नयागांव, जमुनिया,जावी, आदि क्षेत्रों से श्रद्धालु भक्त  सहभागी बने।धर्मसभा का संचालन सचिव मनीष कोठारी ने किया।

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