नीमच। मोहन मुनि जी के मन में वैराग्य के भाव दृढ़ रूप से जागृत थे। बहुत ही विकट परिस्थितियों के बावजूद भी वह अपने निर्णय से कभी नहीं डिगते नहीं थे। उन्हें संयम से रोकने के लिए अनेक प्रयास किए गए लेकिन वह डीगे नहीं। उन्होने संयम जीवन का पालन विनम्रता तपस्या भक्ति और त्याग के साथ किया। आपने अपने संयम जीवन में कई लोगों को धर्म संदेश दिए और उन्हें अहिंसा के पथ की और अग्रसर किया। उन्होंने धर्म जागरण किया। आदिवासियों वनवासियों दलित सबका उत्थान किया। गलत मार्ग पर जाने वाली महिलाओं को धर्म संदेश देकर उनका जीवन परिवर्तित किया।यह बात जैन दिवाकरीय श्रमण संघीय, पूज्य प्रवर्तक, कविरत्न श्री विजयमुनिजी म. सा. ने कही।
वे श्री वर्धमान जैन स्थानकवासी श्रावक संघ के तत्वावधान में वीर पार्क रोड जैन कॉलोनी स्थित श्री वर्धमान जैन स्थानक जैनभवन पर मुनि जी महाराज साहब की 100वीं जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित त्रिदिवसीय धर्मसभा में बोल रहे थे। आप स्वयं दीन दुखियों की गोपनीय रूप से सहायता करवा देते थे।प्रत्येक दार्शनिक को मांगलिक श्रवण करते थे और उनके जीवन के कल्याण के लिए प्रार्थना करते थे। उन्होंने कहा कि मोहन मुनि जी महाराज साहब तप जप साधना भक्ति के लिए सदैव समर्पित भाव से प्रयासरत रहते थे।स्वयं जीवन प्रयंत अन्न ग्रहण नहीं करते थे लेकिन दूसरों के लिए सेवा प्रकल्प में अप्रत्यक्ष रूप से सहयोगी बन प्रेरणा देते थे। कई रोगियों को ठीक करने के लिए जैन दिवाकर चिकित्सालय रतलाम का निर्माण तथा महावीर भवन इंदौर का कायाकल्प,सहित अनेक जीव दया के सेवा प्रकल्प अभियान के लिए सदैव प्रेरणा देते रहते थे।किसी भी संप्रदाय संगठन श्री संघ के कोई किसी भी प्रकार का विवाद होते तो वह एकता स्थापित करवाने के प्रयास से सभी को प्रेरणा देकर विवाद को समाप्त करवा देते थे।सदैव गुरु सेवा के लिए समर्पित कर्तव्य निष्ट भाव के साथ निरंतर कार्य करते रहते थे।
उन्होंने आचार्यआत्माराम जी, आनंद ऋषि जी, देवेंद्र मुनि जी, डॉ शिव मुनि जी, युवाचार्य मधुकर मिश्री जी जैसे आदि महान संतों की अनेक बार सेवा कर धर्म लाभ का पुण्य ग्रहण किया था जो उनके जीवन के लिए एक टर्निंग प्वाइंट बन गया था। आपके मुख से अनेकों साधु-संतों को दीक्षा प्रदान की है जो आज भी देश भर में जीव दया और अहिंसा का पाठ का प्रचार प्रसार कर रहे हैं।आप बहु आयामी व्यक्तित्व के धनी थे। उन्होंने अनेक विशेषताओं के कारण श्रमण संघ के सलाहकार पद को भी सुशोभित किया था।पीड़ित मानवता की सेवा समाज कल्याण और समाज की एकता के लिए किए गए कार्यों के कारण उन्हें श्रमण संघ के महामंत्री पद प्रदान कीया गया । नीमच में भी आपका चातुर्मास हुआ था। उन्होंने मध्य प्रदेश राजस्थान गुजरात पंजाब महाराष्ट्र में अहिंसा का प्रचार बहुत किया था जो आज भी आदर्श प्रेरणादाई कदम है। उनकी सादगी के जीवन को आज भी लोग याद करते हैं।वह हंसमुख प्रकृति के थे मिलनसार व्यक्तित्व के धनी थे।मिलन सरिता उनमें कूट-कूट कर भरी थी कोई भी जाता है उनसे सहज भाव से मेलजोल रखते थे। उनके सभी संप्रदाय के साधु संतों गुरुओं से सद्भाव व्यवहार था।
साध्वी डॉक्टर विजया सुमन श्री जी महाराज साहब ने कहा कि मौत के साथ जिसकी मित्रता होती है ।वही धर्म को कल पर छोड़ता है।धर्म कल के लिए नहीं आज के लिए है और अभी के लिए होता है धर्म बिना आत्म कल्याण नहीं होता है।इस अवसर पर इसमें सभी समाज जनों ने उत्साह के साथ भाग लिया। इस अवसर पर विभिन्न धार्मिक तपस्या पूर्ण होने पर सभी ने सामूहिक अनुमोदना की।धर्म सभा में उपप्रवर्तक श्री चन्द्रेशमुनिजी म. सा, अभिजीतमुनिजी म. सा., अरिहंतमुनिजी म. सा., ठाणा 4 व अरिहंत आराधिका तपस्विनी श्री विजया श्रीजी म. सा. आदि ठाणा का सानिध्य मिला। चातुर्मासिक मंगल धर्मसभा में सैकड़ों समाज जनों ने बड़ी संख्या में उत्साह के साथ भाग लिया और संत दर्शन कर आशीर्वाद ग्रहण किया।