चित्तौड़गढ़। आचार्य श्री नानेश रामेश समता भवन में धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए आचार्य श्री रामेश ने कहा कि भगवान महावीर से प्रश्न पूछा गया था कि जीव में श्रद्धा पैदा होने पर उस जीव को क्या लाभ होता है, क्या फायदा क्या अनुभूति होती है तो भगवान ने कहा कि इन्द्रियों विषयों से आसक्ति हटती है। आसक्ति हटने से कर्म बन्धन रूकता है और धर्म बढ़ता है। धर्म श्रद्धा से आत्मा का सुख सुरक्षित रहता है और धर्म जीवन का प्राण है। जो जीव 5 इन्द्रियों के विषयों में आसक्त होकर जीवन जी रहा था वह जीव धर्म श्रद्धा से अनासक्त बन जाता है। जैसे-जैसे धर्म श्रद्धा का भाव जीवन में आता है, जीवन में परिवर्तन हो जाता है। धन सम्पत्ति आहार सुगन्ध दुर्गन्ध के प्रति अनासक्ति का भाव आ जाता है। स्वाद के प्रति भी रूचि हट जाती है।
आचार्य श्री रमेश ने कहा कि शरीर चलाने के लिए आहार करना है स्वाद के लिए नहीं। श्रद्धा होने से पूर्व जीव स्वाद के लिए आहार करता है और श्रद्धा के बाद शरीर स्वास्थ्य तथा अन्यों की सेवा के लिए आहार करता है। भावों में फर्क आ जाता है। धर्म श्रद्धा से अशुभ कर्मों का बंधन रूक जाता है। भोजन का तरीका समझना चाहिए। उनोदरी तप का महत्व बताते हुए कहा कि भूख से कम खाना चाहिए। पेट खाली रहेगा तो पानी की पर्याप्त जगह रहेगी। ऋतु अनुसार भोजन करना चाहिए। क्या खाना, क्या नहीं खाना ध्यान रखना चाहिए। चैत्र से लेकर फाल्गुन तक किस माह क्या आहार वर्जित माना गया है पूर्ण विवरण धर्मसभा में विस्तार से बताया।
ठण्डी रोटी के फायदे बताते हुए कहा कि आहार में ठण्डी रोटी के प्रयोग से विटामिन बी-12 की समस्या का समाधान हो सकता है। पुराने समय में ठण्डी रोटी दूध के साथ, दही के साथ या घी के साथ खाने का चलन था। वर्तमान में भी अनेक लोग यह आहार करते हैं जो ब्रेड बिस्किट से बेहतर है। जानते सभी हैं लेकिन आहार में सावधानी रखने वाले कम हैं। रात्रि भोजन त्याग के लिए प्रेरणा करते हुए बताया कि रात्रि में किया भोजन शरीर में पच नहीं पाता है, शरीर में विकार उत्पन्न होते हैं। रात्रि भोजन मुनि के लिए निषेध होता है। श्रावक को रात्रि भोजन नहीं करना चाहिए। दिनचर्या कैसी होनी चाहिए। दिनचर्या से स्वास्थ्य प्रभावित होता है। अनुकूल दिनचर्या से जीवन व्यवस्थित रहता है। इन्द्रियों के सुख आत्मा को पतन की ओर ले जाने वाले होते हैं। बड़ा बंगला, बड़ी गाड़ी, फर्नीचर, पसंद वाला आहार इत्यादि में सुख नहीं होता। आहार पानी के सुख जीभ से नीचे उतरने के बाद स्वाद वाले नहीं होते हैं। थोड़े से स्वाद के लिए कितने कर्मों का बंध हो जाता है। सेठ शालिभद्र का उदाहरण विस्तार से बताया। आहार करते समय स्वयं की थाली में देखना, दूसरे के थाली में नहीं देखना चाहिए, नजर नहीं डालना चाहिए। अपने आप में संतुष्ट रहना, सुखी जीवन के लिए आवश्यक है। जो मिल गया पहन लिया। कपड़ा शरीर की लज्जा के लिए है। शरीर को ठंड तथा गर्मी में लू से बचाने के लिए पहनना होता है, दिखावे के लिए नहीं। हार्ट अटैक ब्लॉकेज के कारणों को समझेंगे तो समस्या नहीं होगी। दिखावा से बचना होगा। पाप कर्मों का उपार्जन न हो, सावधानी रखनी होगी। गुरुदेव ने कहा कि अभिमोक्षम शिविर बालक बालिकाओं का हो रहा है, सभी लाभ ले रहे हैं। सभी को चिंतन मनन करना चाहिए। धर्म श्रद्धा का दायरा विशाल है। धर्म से सुख सुरक्षित रहेगा, धर्म जीवन का प्राण है। विचार करें तो जीवन धन्य बनेगा।
धर्मसभा में अनेकों ने रात्रि भोजन त्याग का प्रत्याख्यान लिया। एकासन, बियासना, उपवास, आयम्बिल, बेला, तेला के प्रत्याख्यान हुए। धर्मसभा का संयोजन करते हुए साधुमार्गी जैन श्रावक संघ चित्तौड़गढ़ के पूर्व अध्यक्ष गौतम लाल पोखरना ने उपस्थित धर्मसभा क अभिनन्दन किया। दोपहर में 2.30 बजे से 3.30 बजे तक ज्ञान चर्चा एवं 3.30 बजे मांगलिक तथा सायंकाल प्रतिक्रमण एवं ज्ञानचर्चा के कार्यक्रम हुए।